ฝึกแต่งกระทู้ธรรม

เลือกพุทธศาสนสุภาษิตบทตั้ง ระบบจะเลือกบทเชื่อมและเรียบเรียงเป็นตัวอย่างเรียงความแก้กระทู้ธรรมตามแบบสนามหลวง

เป็นตัวอย่างสำหรับฝึกหัด ไม่ใช่เฉลย — ผู้สอบควรเรียบเรียงด้วยภาษาของตนเอง และจำบาลีกับคัมภีร์ที่มาให้ถูกต้อง

ฉบับทดลอง — คำอธิบายและสำนวนเชื่อมบางส่วนยังอยู่ระหว่างตรวจทาน อาจมีการปรับแก้
ภาษาของเรียงความ / Language : ไทย English Indonesia 中文 Deutsch Dansk हिन्दी 日本語 नेपाली
यह निबन्ध-उदाहरण केवल अभ्यास के लिए है, आधिकारिक उत्तर नहीं। कृपया अपने शब्दों में लिखें और पालि पाठ तथा उसका स्रोत सही-सही याद करें।
เรียงความภาษาฮินดี ใช้ได้เฉพาะสุภาษิตที่มีคำอธิบายฉบับแปลแล้ว — นักธรรมชั้นตรี มี ๔๓ บท · บาลีแสดงเป็นอักษรโรมัน
สุ่มบทตั้ง
นักธรรมชั้นตรี · สนามหลวงกำหนดให้อ้างสุภาษิตมาประกอบอย่างน้อย ๑ บท และเขียนไม่น้อยกว่า ๒ หน้ากระดาษ · ต้องบอกชื่อคัมภีร์ที่มา และไม่ซ้ำกับบทตั้ง · บทเชื่อมใช้เฉพาะสุภาษิตในพุทธศาสนสุภาษิต เล่ม ๑
สุภาษิตบทเชื่อมที่เข้ากัน
ชั้นนี้เชื่อม ๑ บท · กดเลือกบทอื่นเพื่อเปลี่ยนแทนบทเดิม · เลือกครบแล้วระบบแต่งใหม่ทันที
ตัวอย่างนี้เรียบเรียงจากคำอธิบายพุทธศาสนสุภาษิตที่ผ่านการตรวจทาน ใช้ดูแนวการวางโครงเรื่องและการเชื่อมความ ไม่ใช่เฉลยของสนามหลวง ผู้สอบควรฝึกเขียนด้วยสำนวนของตนเอง
นักธรรมชั้นตรี · บทเชื่อม ๑ บท · ภาษาฮินดี ประมาณ ๖๖๕ คำ
สุ่มสำนวนเชื่อม
Pāpānaṃ akaraṇaṃ sukhaṃ
पाप न करना सुख लाता है।
(खुद्दकनिकाय, धम्मपद 25/59)

อารัมภบทअब आरम्भ में उद्धृत धम्म-विषय के अर्थ की विस्तार से व्याख्या की जाएगी, ताकि वह अध्ययन और आचरण के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो।

อธิบายบทตั้งव्याख्या इस प्रकार है: यह सूक्ति सिखाती है कि पाप न करना सुख लाता है। "पाप न करना" का अर्थ है काया, वाणी और मन से सभी पापों से विरत रहना; और यहाँ "सुख" का अर्थ है शरीर और मन की सहजता, हल्कापन, ऐसी अवस्था जिसमें किसी बात से डरने या चिंता करने का कारण न हो। यह बुद्ध-वचन दर्शाता है कि सुख आवश्यक रूप से वस्तुओं के स्वामित्व से नहीं मिलता, बल्कि बुरे कार्य न करने से भी उत्पन्न हो सकता है।

ขยายความบทตั้งपाप न करने से उत्पन्न सुख गहरा और स्थिर होता है। जो पाप नहीं करता, वह गहरी नींद सोता है; उसे डर नहीं होता कि उसका दोष प्रकट हो जाएगा, उसे दूसरों पर संदेह नहीं करना पड़ता, उसे अपना दोष छिपाने के लिए झूठ नहीं बोलना पड़ता; अतः उसका मन हल्का और सहज रहता है। इसके विपरीत, पाप करने वाला भले ही जो चाहता था वह पा ले, उसका मन भय, लज्जा और पश्चात्ताप से जलता रहता है। धम्मपद में यह बुद्ध-वचन इन कथनों के साथ आता है कि "शील वृद्धावस्था तक सुख लाता है, दृढ़ श्रद्धा सुख लाती है, प्रज्ञा की प्राप्ति सुख लाती है", जिससे पता चलता है कि पाप न करना सभी सुखों की नींव है।

ประโยคสะพาน + ที่มา ๑जो स्वयं से प्रेम करता है और सुख की कामना करता है, उसे छोटे-बड़े हर प्रकार के पाप से, शरीर, वाणी और मन तीनों से, बचना चाहिए। न उसके पास जाना चाहिए और न उसे करना चाहिए। यह खुद्दकनिकाय-धम्मपद में आए बुद्धवचन के अनुरूप है:

อธิบายบทเชื่อม ๑व्याख्या इस प्रकार है: यह सूक्ति सिखाती है कि सभी पापों से बचना चाहिए। "बचना" का अर्थ है दूर रहना, निकट न जाना और उसे न करना। "सभी पाप" का अर्थ है हर प्रकार का पाप, चाहे छोटा हो या बड़ा, काया से हो, वाणी से हो या मन से। यह बुद्ध-वचन एक सीधी शिक्षा है कि जो स्वयं से प्रेम करता है और सुख चाहता है, उसे सावधानी से हर प्रकार के पाप से बचना चाहिए।

อธิบายบทเชื่อม ๑धम्मपद में भगवान बुद्ध ने उपमा दी है कि जैसे बहुत धन वाला किंतु थोड़े साथियों वाला व्यापारी भय और संकट से भरे मार्ग से बचता है, और जैसे जीवन से प्रेम करने वाला व्यक्ति विष से बचता है, वैसे ही व्यक्ति को सभी पापों से बचना चाहिए। जो व्यापारी जानता है कि किस मार्ग पर चोर हैं, वह उस मार्ग पर नहीं जाता, क्योंकि वह जानता है कि वहाँ वह धन और जीवन दोनों खो सकता है। जो व्यक्ति जानता है कि कौन-सी वस्तु विष है, वह उसे छूता नहीं, क्योंकि वह जानता है कि इससे मृत्यु हो सकती है। पाप भी चोरों वाले मार्ग और विष के समान है। जो इसे समझता है, वह आरंभ से ही उससे दूर रहता है और संकट में पड़ने की प्रतीक्षा नहीं करता।

ตัวอย่างในชีวิตवास्तविक जीवन में, जो विद्यार्थी अपनी क्षमता से परीक्षा देता है, भले ही उसके अंक बहुत ऊँचे न आएँ, उसका मन शांत रहता है और वह स्वयं पर गर्व करता है, उस विद्यार्थी से भिन्न जो नकल करता है और सदा पकड़े जाने से डरता रहता है। जो कर्मचारी ईमानदारी से काम करता है और रिश्वत नहीं लेता, वह शांति से जीवन जीता है और उसे जाँच का भय नहीं होता। जो पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहते हैं, वे विश्वास और सुख के साथ साथ रहते हैं।

สรุปनिष्कर्ष यह है: जो सच्चा सुख चाहता है, उसे पाप न करने से आरंभ करना चाहिए, तब भी जब कोई देख न रहा हो, क्योंकि पाप न करने से मिलने वाला सुख ऐसा सुख है जिसे धन से खरीदना नहीं पड़ता और जिसे कोई छीन नहीं सकता। यह आरम्भ में विषय के रूप में उद्धृत धम्म-वचन के अनुरूप है:

Pāpānaṃ akaraṇaṃ sukhaṃ
पाप न करना सुख लाता है।

ปิดท้ายइस प्रकार ऊपर वर्णित रूप में इसका आशय स्पष्ट किया गया।

พุทธศาสนสุภาษิต แบบฝึกท่องจำ หน้าหลัก