ฝึกแต่งกระทู้ธรรม

เลือกพุทธศาสนสุภาษิตบทตั้ง ระบบจะเลือกบทเชื่อมและเรียบเรียงเป็นตัวอย่างเรียงความแก้กระทู้ธรรมตามแบบสนามหลวง

เป็นตัวอย่างสำหรับฝึกหัด ไม่ใช่เฉลย — ผู้สอบควรเรียบเรียงด้วยภาษาของตนเอง และจำบาลีกับคัมภีร์ที่มาให้ถูกต้อง

ฉบับทดลอง — คำอธิบายและสำนวนเชื่อมบางส่วนยังอยู่ระหว่างตรวจทาน อาจมีการปรับแก้
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यह निबन्ध-उदाहरण केवल अभ्यास के लिए है, आधिकारिक उत्तर नहीं। कृपया अपने शब्दों में लिखें और पालि पाठ तथा उसका स्रोत सही-सही याद करें।
เรียงความภาษาฮินดี ใช้ได้เฉพาะสุภาษิตที่มีคำอธิบายฉบับแปลแล้ว — นักธรรมชั้นโท มี ๒๙ บท · บาลีแสดงเป็นอักษรโรมัน
สุ่มบทตั้ง
นักธรรมชั้นโท · สนามหลวงกำหนดให้อ้างสุภาษิตมาประกอบอย่างน้อย ๒ บท และเขียนไม่น้อยกว่า ๓ หน้ากระดาษ · ต้องบอกชื่อคัมภีร์ที่มา และไม่ซ้ำกับบทตั้ง · บทเชื่อมใช้เฉพาะสุภาษิตในพุทธศาสนสุภาษิต เล่ม ๒
สุภาษิตบทเชื่อมที่เข้ากัน
ชั้นนี้เชื่อม ๒ บท · ลำดับที่กดเลือก = ลำดับในเรียงความ · ครบแล้วต้องเอาบทเดิมออกก่อนจึงเลือกบทอื่นได้ · เลือกครบแล้วระบบแต่งใหม่ทันที
ตัวอย่างนี้เรียบเรียงจากคำอธิบายพุทธศาสนสุภาษิตที่ผ่านการตรวจทาน ใช้ดูแนวการวางโครงเรื่องและการเชื่อมความ ไม่ใช่เฉลยของสนามหลวง ผู้สอบควรฝึกเขียนด้วยสำนวนของตนเอง
นักธรรมชั้นโท · บทเชื่อม ๒ บท · ภาษาฮินดี ประมาณ ๑,๐๖๙ คำ
สุ่มสำนวนเชื่อม
Yo pubbe katakalyāṇoKatattho nāvabujjhati
Atthā tassa palujjantiYe honti abhipatthitā
जो पहले दूसरों द्वारा किए गए उपकार और हित को नहीं पहचानता, उसके वांछित प्रयोजन नष्ट हो जाते हैं।
(खुद्दकनिकाय, जातक, सत्तकनिपात 27/228)

อารัมภบทअब आरम्भ में उद्धृत धम्म-विषय के अर्थ की विस्तार से व्याख्या की जाएगी, ताकि वह अध्ययन और आचरण के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो।

อธิบายบทตั้งव्याख्या इस प्रकार है: यह सूक्ति कृतघ्नता की हानि बताती है, अर्थात् दूसरों द्वारा हमारे लिए की गई भलाई को न पहचानना या उसका मूल्य न समझना।

ขยายความบทตั้งजो दूसरों का उपकार नहीं मानता, वह प्रायः मिली सहायता को सामान्य बात या अपना अधिकार समझता है। लाभ पाने के बाद वह उसे भूल जाता है, या कभी-कभी बुरे कर्मों से उसका बदला भी देता है। परिणामस्वरूप लोग उस पर विश्वास खो देते हैं और सहायता नहीं करना चाहते। जब उसे सहायता की आवश्यकता होती है या वह कुछ चाहता है, तो उसके साथ कोई नहीं होता, और इच्छित लाभ नष्ट हो जाता है।

ขยายความบทตั้งबुद्धशासन कृतज्ञता को सज्जन का लक्षण बताता है। संसार में दुर्लभ व्यक्तियों में से एक वह है जो दूसरों का उपकार मानता है और उसका प्रतिदान करता है। इसलिए कृतघ्नता कोई छोटा दोष नहीं, बल्कि संबंधों और जीवन के अवसरों को नष्ट करने वाली चीज़ है। उपकार मानने के लिए सदा मूल्यवान वस्तुओं से बदला चुकाना आवश्यक नहीं; उसे याद रखना, धन्यवाद देना और सहायता करने वालों को हानि न पहुँचाना ही महत्त्वपूर्ण नींव है।

ประโยคสะพาน + ที่มา ๑जो काम छोड़ने के लिए बहाने ढूँढता रहता है कि बहुत ठंड है, बहुत गर्मी है या बहुत देर हो गई, वह उन लाभों से वंचित रह जाता है जो उसे मिलने चाहिए, क्योंकि अवसर और समय कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करते। यह दीघनिकाय-पाटिकवग्ग में आए बुद्धवचन के अनुरूप है:

อธิบายบทเชื่อม ๑व्याख्या इस प्रकार है: यह सूक्ति सिखाती है कि जो सदा काम टालने या छोड़ने के बहाने खोजता है, वह उन लाभों से वंचित रह जाता है जो उसे मिलने चाहिए थे, क्योंकि अवसर और समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करते।

อธิบายบทเชื่อม ๑यह सूक्ति सिगालक सुत्त से ली गई है, जो भगवान बुद्ध ने युवक सिगालक को उपदेश दिया था, जिसमें आलस्य के दोष बताए गए: आलसी व्यक्ति प्रायः कहता है कि बहुत ठंड है, बहुत गर्मी है, बहुत देर हो गई, बहुत जल्दी है, बहुत भूख है, बहुत पेट भरा है, और इसलिए काम नहीं करता। परिणामस्वरूप जो धन अभी उत्पन्न नहीं हुआ, वह उत्पन्न नहीं होता, और जो उत्पन्न हो चुका है, वह समाप्त हो जाता है। ये बहाने तर्कसंगत लगते हैं, पर वास्तव में मन के आलस्य को ढकते हैं।

อธิบายบทเชื่อม ๑आलसी के बहानों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है: वे कभी समाप्त नहीं होते। ठंड से बचो तो गर्मी आ जाती है; गर्मी से बचो तो शाम हो जाती है। यदि सब कुछ तैयार होने की प्रतीक्षा की जाए, तो शायद कुछ भी न हो। फिर भी, सचमुच थके या बीमार होने पर विश्राम आवश्यक है। यह सूक्ति कर्तव्य से बचने के लिए बहानों के उपयोग की चेतावनी देती है; स्वास्थ्य का ध्यान रखने से नहीं रोकती।

ประโยคสะพาน + ที่มา ๒जब व्यक्ति कामों की प्राथमिकता जानता है और पहले किए जाने योग्य काम समय पर पूरा कर लेता है, तो उसे बाद में पछताना नहीं पड़ता। इसके विपरीत प्रमादी व्यक्ति को तब जल्दबाज़ी में सुधार करना पड़ता है जब बहुत देर हो चुकी होती है। यह खुद्दकनिकाय-जातक-एकनिपात में आए बुद्धवचन के अनुरूप है:

อธิบายบทเชื่อม ๒व्याख्या इस प्रकार है: यह सूक्ति कामों का क्रम तय करना और उचित समय पर काम में लगना सिखाती है, टालमटोल न करना, क्योंकि जब महत्त्वपूर्ण काम को अंतिम क्षण तक छोड़ दिया जाता है, तो उसे जल्दबाज़ी में करना पड़ सकता है, जिससे भूलें होती हैं और बाद में कष्ट आता है।

อธิบายบทเชื่อม ๒वरुण जातक की अट्ठकथा में कथा है कि युवकों, अर्थात् नवयुवकों, का एक समूह जंगल में लकड़ी इकट्ठा करने गया। एक युवक ने वरुण का एक वृक्ष देखा और उसे सूखी लकड़ी समझकर सोचा कि पहले लेटकर आराम कर लूँ, फिर लकड़ी तोड़ूँगा। जब साथियों ने उसे जगाया, तो वह जल्दी से पेड़ पर चढ़कर डालियाँ तोड़ने लगा, और एक डाली उछलकर उसकी आँख में लगी और वह घायल हो गया। वह हरी लकड़ी लाकर अपने साथियों की लकड़ी के ऊपर रख आया। अगली सुबह भोजन पकाने वाले ने वही हरी लकड़ी उठाकर प्रयोग की, पर देर तक आग नहीं जला पाया, जिससे पूरा समूह तय समय पर यात्रा नहीं कर सका। यह कथा दिखाती है कि टालमटोल करके बाद में जल्दबाज़ी में काम करना स्वयं को और दूसरों को भी हानि पहुँचा सकता है।

อธิบายบทเชื่อม ๒हर काम का अपना क्रम और उचित समय होता है। कुछ काम पहले पूरे करने पड़ते हैं, तभी दूसरे काम शुरू हो सकते हैं। पहले से तैयारी करने से सोचने, जाँचने और भूलें सुधारने का समय मिलता है, पर जब काम को समय समाप्त होने के निकट तक छोड़ दिया जाता है, तो शायद उसे केवल पूरा ही किया जा सके, सावधानी से जाँचने का अवसर नहीं मिलता। इसलिए कुछ कष्ट टालमटोल और समय पर तैयारी न करने से उत्पन्न होते हैं, जबकि जल्दी काम शुरू करके समस्याओं को कम किया जा सकता था।

ตัวอย่างในชีวิตदैनिक जीवन में, जिन बच्चों का पालन माता-पिता ने किया, पर बड़े होकर वे उनकी देखभाल की उपेक्षा करते हैं, वे परिवार की आत्मीयता खो देते हैं और समाज की निंदा पाते हैं। जिस विद्यार्थी को शिक्षक ने सफल होने में सहायता की, पर बाद में वह उसी शिक्षक के बारे में अपमानजनक बातें करता है, वह विश्वसनीयता खो देता है। जिस कर्मचारी को संस्था ने विकास का अवसर दिया, पर बाद में उसने संस्था के रहस्य उजागर कर दिए, उस पर फिर कोई विश्वास नहीं करेगा।

สรุปनिष्कर्ष यह है: जो उन्नति चाहता है, उसे सदा दूसरों द्वारा किए गए उपकार को याद रखना चाहिए, धन्यवाद देना चाहिए और भलाई का बदला कभी बुराई से नहीं देना चाहिए। यह आरम्भ में विषय के रूप में उद्धृत धम्म-वचन के अनुरूप है:

Yo pubbe katakalyāṇoKatattho nāvabujjhati
Atthā tassa palujjantiYe honti abhipatthitā
जो पहले दूसरों द्वारा किए गए उपकार और हित को नहीं पहचानता, उसके वांछित प्रयोजन नष्ट हो जाते हैं।

ปิดท้ายइस प्रकार ऊपर वर्णित रूप में इसका आशय स्पष्ट किया गया।

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