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ฉบับทดลอง — คำอธิบายและสำนวนเชื่อมบางส่วนยังอยู่ระหว่างตรวจทาน อาจมีการปรับแก้
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เรียงความภาษาฮินดี ใช้ได้เฉพาะสุภาษิตที่มีคำอธิบายฉบับแปลแล้ว — ธรรมศึกษาชั้นโท ระดับประถมศึกษา มี ๖ บท · บาลีแสดงเป็นอักษรโรมัน
สุ่มบทตั้ง
ธรรมศึกษาชั้นโท ระดับประถมศึกษา · ขอบข่ายหลักสูตร ๒๕๖๔ กำหนดให้อ้างอิงสุภาษิตที่กำหนดให้เท่านั้น ไม่น้อยกว่า ๒ สุภาษิต ความยาวตั้งแต่ ๓ หน้าขึ้นไป (เว้นบรรทัด) พร้อมยกตัวอย่างเหตุการณ์ในชีวิตประจำวัน · บทเชื่อมใช้เฉพาะ ๑๕ บทในขอบข่ายของช่วงชั้นนี้
สุภาษิตบทเชื่อมที่เข้ากัน
ชั้นนี้เชื่อม ๒ บท · ลำดับที่กดเลือก = ลำดับในเรียงความ · ครบแล้วต้องเอาบทเดิมออกก่อนจึงเลือกบทอื่นได้ · เลือกครบแล้วระบบแต่งใหม่ทันที
ตัวอย่างนี้เรียบเรียงจากคำอธิบายพุทธศาสนสุภาษิตที่ผ่านการตรวจทาน ใช้ดูแนวการวางโครงเรื่องและการเชื่อมความ ไม่ใช่เฉลยของสนามหลวง ผู้สอบควรฝึกเขียนด้วยสำนวนของตนเอง
ธรรมศึกษาชั้นโท ระดับประถมศึกษา · บทเชื่อม ๒ บท · ภาษาฮินดี ประมาณ ๘๗๗ คำ
สุ่มสำนวนเชื่อม
Puññaṃ corehi dūharaṃ
पुण्य को चोर नहीं ले जा सकते।
(संयुत्तनिकाय, सगाथावग्ग 15/50)

อารัมภบทअब आरम्भ में उद्धृत धम्म-विषय के अर्थ की विस्तार से व्याख्या की जाएगी, ताकि वह अध्ययन और आचरण के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो।

อธิบายบทตั้งव्याख्या इस प्रकार है: "पुण्य" का अर्थ है वह शुभता जो दान देने, शील का पालन करने, भावना का अभ्यास करने और अन्य अच्छे कर्म करने से मन में उत्पन्न होती है। यह सूक्ति सिखाती है कि पुण्य ऐसा धन है जिसे चोर नहीं ले जा सकते। यह बाहरी धन, जैसे रुपये-पैसे, सोना, घर, गाड़ी और आभूषणों से भिन्न है, जो कभी भी चोरी हो सकते हैं, आग में जल सकते हैं, बाढ़ में बह सकते हैं या खो सकते हैं।

ขยายความบทตั้งजिस सुत्त से यह सूक्ति ली गई है, उसमें प्रश्न है: बुढ़ापे तक क्या अच्छा रहता है? क्या दृढ़ता से स्थापित होने पर अच्छा है? मनुष्यों का रत्न क्या है? और किसे चोर नहीं ले जा सकते? उत्तर है: शील बुढ़ापे तक अच्छा रहता है, श्रद्धा दृढ़ता से स्थापित होने पर अच्छी है, प्रज्ञा मनुष्यों का रत्न है और पुण्य को चोर नहीं ले जा सकते। चोर पुण्य को इसलिए नहीं ले जा सकते क्योंकि पुण्य किसी तिजोरी या बैंक में नहीं, बल्कि करने वाले के मन में रहता है। कोई उसमें हाथ डालकर उसे चुरा नहीं सकता, कोई प्राकृतिक आपदा उसे नष्ट नहीं कर सकती, और वह पुण्य करने वाले के साथ हर जगह जाता है, यहाँ तक कि एक भव से दूसरे भव तक और एक जन्म से दूसरे जन्म तक भी।

ประโยคสะพาน + ที่มา ๑जब जीवन समाप्त होने को होता है, तब धन-सम्पत्ति, पद-प्रतिष्ठा और प्रियजन कोई सहायता नहीं कर सकते। किन्तु पहले किया गया पुण्य मन का सहारा बनता है और व्यक्ति शान्ति से विदा होता है। यह खुद्दकनिकाय-धम्मपद में आए बुद्धवचन के अनुरूप है:

อธิบายบทเชื่อม ๑व्याख्या इस प्रकार है: "जीवन के अंत का समय" का अर्थ है वह समय जब जीवन समाप्त होने वाला होता है, जिससे अधिकांश लोग डरते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी सभी प्रिय वस्तुओं से बिछुड़ना पड़ता है। यह सूक्ति सिखाती है कि पुण्य ऐसे समय में सुख लाता है, अर्थात् जब धन-संपत्ति, यश और पद तथा प्रियजन कुछ भी सहायता नहीं कर सकते, तब पहले किया हुआ पुण्य मन का सहारा बनता है और व्यक्ति शांति से, बिना भय के विदा होता है।

อธิบายบทเชื่อม ๑मृत्यु के निकट आने पर लोगों का मन प्रायः उन कर्मों का स्मरण करता है जो उन्होंने किए हैं। जिसने बहुत पाप किए हैं, वह उन पापों को मन की व्याकुलता के साथ याद करता है और आने वाले फल से डरता है। परंतु जिसने बहुत पुण्य किए हैं, वह अपनी भलाई को संतोष के साथ याद करता है; उसके पास पछताने या अधूरा छोड़ने को कुछ नहीं होता। अंतिम क्षण का यह मानसिक सुख पुण्य का स्पष्ट दिखाई देने वाला फल है, और बुद्ध-शासन के अनुसार जीवन के अंत में निर्मल चित्त सुगति में जाने का कारण भी बनता है।

ประโยคสะพาน + ที่มา ๒जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से थोड़ा-थोड़ा पुण्य का संचय करता है, तो सुख भी उसके साथ बढ़ता जाता है। इसके ठीक विपरीत पाप का संचय करने वाले को फल के रूप में केवल दुःख ही मिलता है। यह खुद्दकनिकाय-धम्मपद में आए बुद्धवचन के अनुरूप है:

อธิบายบทเชื่อม ๒व्याख्या इस प्रकार है: "पुण्य का संचय" का अर्थ है सदा भलाई करते रहना, उसे बार-बार दोहराना, यहाँ तक कि भलाई बढ़ती जाए और स्वभाव बन जाए। यह सूक्ति सिखाती है कि इस प्रकार पुण्य का संचय सुख लाता है। यह बुद्ध-वचन उस बुद्ध-वचन का विपरीत युग्म है कि पाप का संचय दुःख लाता है। इससे पता चलता है कि हम अपने जीवन में जो संचय करते हैं, वही निर्धारित करता है कि हमारा जीवन सुखमय होगा या दुःखमय।

อธิบายบทเชื่อม ๒धम्मपद में भगवान बुद्ध ने कहा है कि यदि कोई पुरुष पुण्य करे, तो उसे वह पुण्य बार-बार करना चाहिए और उस पुण्य में रुचि उत्पन्न करनी चाहिए, क्योंकि पुण्य का संचय सुख लाता है। एक अन्य स्थान पर उन्होंने कहा है कि पुण्य को छोटा समझकर यह नहीं सोचना चाहिए कि इसका कोई फल नहीं होगा, क्योंकि पानी का घड़ा एक-एक बूँद टपकने से भी भर जाता है; प्रज्ञावान व्यक्ति थोड़ा-थोड़ा पुण्य संचित करके भी पुण्य से भर जाता है। इसलिए नियमित रूप से की गई छोटी-छोटी भलाई कभी-कभार की गई बड़ी भलाई से अधिक शक्तिशाली होती है।

ตัวอย่างในชีวิตवास्तविक जीवन में हम देखते हैं कि बहुत धन वाले कुछ लोग किसी दिन धोखाधड़ी, व्यवसाय के दिवालिया होने या किसी आपदा के कारण सब कुछ खो सकते हैं। परंतु उन्होंने जो भलाई की थी, जैसे दूसरों की सहायता, ईमानदारी और उदारता, वह लोगों की स्मृति में बनी रहती है और प्रायः कठिन समय में लोग उसकी सहायता के लिए हाथ बढ़ाते हैं। जिस विद्यार्थी ने सच्चे मन से अपने साथी की सहायता की थी, वह भलाई सदा उसी की रहती है; कोई उसे छीन नहीं सकता।

สรุปनिष्कर्ष यह है: जो सुरक्षित और स्थिर धन चाहता है, उसे केवल बाहरी धन इकट्ठा नहीं करना चाहिए, बल्कि सदा पुण्य का संचय करना चाहिए, क्योंकि पुण्य ही वह सच्चा धन है जो कभी नष्ट नहीं होता। यह आरम्भ में विषय के रूप में उद्धृत धम्म-वचन के अनुरूप है:

Puññaṃ corehi dūharaṃ
पुण्य को चोर नहीं ले जा सकते।

ปิดท้ายइस प्रकार ऊपर वर्णित रूप में इसका आशय स्पष्ट किया गया।

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