ชุดตัวอย่างเรียงความแก้กระทู้ธรรม (ข้อสอบสนามหลวงปีเก่า) กลับหน้าฝึกแต่งกระทู้
ชั้น: นักธรรมชั้นโท ๒ธรรมศึกษาชั้นตรี ประถม ๕ธรรมศึกษาชั้นตรี มัธยม ๕ธรรมศึกษาชั้นตรี อุดม ๑ธรรมศึกษาชั้นโท ประถม ๔ธรรมศึกษาชั้นโท มัธยม ๓ธรรมศึกษาชั้นเอก ประถม ๑ธรรมศึกษาชั้นเอก มัธยม ๑ธรรมศึกษาชั้นเอก อุดม ๑
ภาษา: ไทย EnglishIndonesia中文DeutschDanskहिन्दी日本語नेपाली
แสดงป้ายโครงสร้าง ในหน้าต่างพิมพ์ ให้เลือกปลายทาง "บันทึกเป็น PDF" และเปิด "กราฟิกพื้นหลัง" เพื่อให้เห็นแถบสี
ตัวอย่างสำหรับฝึกหัด ไม่ใช่เฉลยของสนามหลวง

ตัวอย่างเรียงความแก้กระทู้ธรรม

ธรรมศึกษาชั้นตรี มัธยม

จากข้อสอบสนามหลวงปีเก่า ๕ ข้อ · ภาษาฮินดี
ข้อพ.ศ.กระทู้ตั้งบทเชื่อม
๑๒๕๖๘ สุโข ปุญฺญสฺส อุจฺจโย๑
๒๒๕๖๗ ปุญฺญํ โจเรหิ ทูหรํ๑
๓๒๕๖๖ สุโข ปุญฺญสฺส อุจฺจโย๑
๔๒๕๖๕ สีลํ โลเก อนุตฺตรํ๑
๕๒๕๖๓ ปุญฺญานิ ปรโลกสฺมึ ปติฏฺฐา โหนฺติ ปาณินํ๑

วิธีใช้: อ่านกระทู้ตั้งแล้วลองวางโครงเรื่องด้วยตนเองก่อน จึงเปิดดูตัวอย่าง สังเกตลำดับ: บทตั้ง → อารัมภบท → อธิบายบทตั้ง → ขยายความ → ประโยคสะพานและบทเชื่อม (บอกคัมภีร์ที่มา) → อธิบายบทเชื่อม → ตัวอย่างในชีวิต → สรุปพร้อมยกบทตั้ง → ปิดท้าย

ตัวอย่างเรียบเรียงโดยระบบจากคำอธิบายพุทธศาสนสุภาษิต บทเชื่อมเลือกจากสุภาษิตที่โจทย์กำหนดให้ (ธรรมศึกษา) หรือจากสุภาษิตในหนังสือของชั้นนั้นที่เนื้อความเข้ากัน (นักธรรม) ผู้สอบควรเรียบเรียงด้วยสำนวนของตนเอง และจำบาลีกับคัมภีร์ที่มาให้ถูกต้อง

พิมพ์จากระบบสนับสนุนการออกข้อสอบ · 01/10/2569

ข้อ ๑ · ข้อสอบสนามหลวง พ.ศ. ๒๕๖๘ ธรรมศึกษาชั้นตรี มัธยม · บทเชื่อม ๑ บท (เลือกจากที่โจทย์กำหนด) · ประมาณ ๕๙๕ คำ
โจทย์: สุโข ปุญฺญสฺส อุจฺจโย. การสั่งสมขึ้นซึ่งบุญ นำสุขมาให้. แต่งอธิบายให้สมเหตุสมผล โดยใช้สุภาษิตที่สนามหลวงแผนกธรรม กำหนดมาให้จำนวน ๓ สุภาษิตข้างล่างนี้มาประกอบอ้างอิงเพียง ๑ สุภาษิต และสุภาษิตที่อ้างมานั้น ควรอธิบายเชื่อมความให้สมกับเรื่องในกระทู้ตั้ง ในชั้นนี้กำหนดให้เขียนลงในกระดาษใบตอบตั้งแต่ ๒ หน้า (เว้นบรรทัด) ขึ้นไป สีลํ โลเก อนุตฺตรํ. ศีลเป็นเยี่ยมในโลก คัมภีร์ที่มา : ขุททกนิกาย ชาดก เอกนิบาต (ขุ.ชา.เอก.) ทุกฺโข ปาปสฺส อุจฺจโย. ความสั่งสมบาป นำทุกข์มาให้ คัมภีร์ที่มา : ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ.ธ) กมฺมุนา วตฺตตี โลโก. สัตว์โลกย่อมเป็นไปตามกรรม คัมภีร์ที่มา : ขุททกนิกาย สุตตนิบาต (ขุ.ส.)
Sukho puññassa uccayo
पुण्य का संचय सुख लाता है।
(खुद्दकनिकाय, धम्मपद 25/30)

อารัมภบทअब आरम्भ में उद्धृत धम्म-विषय के अर्थ की विस्तार से व्याख्या की जाएगी, ताकि वह अध्ययन और आचरण के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो।

อธิบายบทตั้งव्याख्या इस प्रकार है: "पुण्य का संचय" का अर्थ है सदा भलाई करते रहना, उसे बार-बार दोहराना, यहाँ तक कि भलाई बढ़ती जाए और स्वभाव बन जाए। यह सूक्ति सिखाती है कि इस प्रकार पुण्य का संचय सुख लाता है। यह बुद्ध-वचन उस बुद्ध-वचन का विपरीत युग्म है कि पाप का संचय दुःख लाता है। इससे पता चलता है कि हम अपने जीवन में जो संचय करते हैं, वही निर्धारित करता है कि हमारा जीवन सुखमय होगा या दुःखमय।

ขยายความบทตั้งधम्मपद में भगवान बुद्ध ने कहा है कि यदि कोई पुरुष पुण्य करे, तो उसे वह पुण्य बार-बार करना चाहिए और उस पुण्य में रुचि उत्पन्न करनी चाहिए, क्योंकि पुण्य का संचय सुख लाता है। एक अन्य स्थान पर उन्होंने कहा है कि पुण्य को छोटा समझकर यह नहीं सोचना चाहिए कि इसका कोई फल नहीं होगा, क्योंकि पानी का घड़ा एक-एक बूँद टपकने से भी भर जाता है; प्रज्ञावान व्यक्ति थोड़ा-थोड़ा पुण्य संचित करके भी पुण्य से भर जाता है। इसलिए नियमित रूप से की गई छोटी-छोटी भलाई कभी-कभार की गई बड़ी भलाई से अधिक शक्तिशाली होती है।

ประโยคสะพาน + ที่มา ๑बार-बार बुरे कर्म करते रहने से जब वे आदत बन जाते हैं, तो दुःख ही लाते हैं, क्योंकि हर पाप पात्र में गिरती जल की बूँद के समान है, जो जमा होते-होते अन्त में पात्र को भर देती है। यह खुद्दकनिकाय-धम्मपद में आए बुद्धवचन के अनुरूप है:

อธิบายบทเชื่อม ๑व्याख्या इस प्रकार है: "पाप का संचय" का अर्थ है बार-बार पाप करना, यहाँ तक कि वह पाप निरंतर बढ़ता जाए और स्वभाव बन जाए। यह सूक्ति सिखाती है कि इस प्रकार पाप का संचय दुःख लाता है, क्योंकि हर एक पाप पात्र में टपकती पानी की बूँद के समान है: जब वह निरंतर टपकती रहती है, तो अंत में पात्र भर जाता है।

อธิบายบทเชื่อม ๑धम्मपद में भगवान बुद्ध ने चेतावनी दी है कि यदि कोई पुरुष पाप करे, तो उसे वह पाप बार-बार नहीं करना चाहिए और उसमें रुचि नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि पाप का संचय दुःख लाता है। बहुत-से लोग सोचते हैं कि छोटे-मोटे पाप कोई बात नहीं, जैसे थोड़ा-सा झूठ बोलना या दूसरों की थोड़ी-सी वस्तु ले लेना; किंतु यही सोच पाप को और अधिक संचित कराती है। जब व्यक्ति उसका अभ्यस्त हो जाता है, तो मन में लज्जा नहीं रहती और बड़े पाप आसानी से पीछे-पीछे आते हैं। अंततः दुःख आ ही जाता है, कानूनी दंड, अपयश और मन की पीड़ा के रूप में।

ตัวอย่างในชีวิตवास्तविक जीवन में, जो व्यक्ति प्रतिदिन सुबह उठकर पिण्डपात देता है, सोने से पहले वन्दना-पाठ करता है और दूसरों की सहायता करने में तत्पर रहता है, भले ही वह प्रतिदिन थोड़ा ही करे, कई वर्ष बीतने पर उसका मन निर्मल और सुखी होता है और वह लोगों का प्रिय होता है। जो विद्यार्थी प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा पाठ दोहराता है, उसका ज्ञान उस विद्यार्थी से अधिक दृढ़ होता है जो केवल परीक्षा से पहले की रात कड़ी पढ़ाई करता है। भलाई का संचय भी इसी प्रकार होता है।

สรุปनिष्कर्ष यह है: जो स्थायी सुख चाहता है, उसे प्रतिदिन परिश्रम से भलाई करनी चाहिए, छोटी या बड़ी का भेद किए बिना और किसी विशेष अवसर की प्रतीक्षा किए बिना, क्योंकि संचित भलाई जीवन भर के सुख का आधार बनती है। यह आरम्भ में विषय के रूप में उद्धृत धम्म-वचन के अनुरूप है:

Sukho puññassa uccayo
पुण्य का संचय सुख लाता है।

ปิดท้ายइस प्रकार ऊपर वर्णित रूप में इसका आशय स्पष्ट किया गया।

ข้อ ๒ · ข้อสอบสนามหลวง พ.ศ. ๒๕๖๗ ธรรมศึกษาชั้นตรี มัธยม · บทเชื่อม ๑ บท (เลือกจากที่โจทย์กำหนด) · ประมาณ ๗๐๔ คำ
โจทย์: บุญอันโจรนำไปไม่ได้. แต่งอธิบายให้สมเหตุสมผล โดยใช้สุภาษิตที่สนามหลวงแผนกธรรมกำหนดมาให้ จำนวน ๓ สุภาษิตข้างล่าง มาประกอบอ้างอิงเพียง ๑ สุภาษิต และสุภาษิตที่อ้างมานั้น ควรอธิบายเชื่อมความให้สมกับเรื่องในกระทู้ตั้งในชั้นนี้ กำหนดให้เขียนลงในใบกระดาษใบตอบตั้งแต่ ๒ หน้า (เว้นบรรทัด) ขึ้นไป สุโข ปุญฺญสฺส อุจฺจโย. การสั่งสมซึ่งบุญ นำสุขมาให้. คัมภีร์ที่มา : ขุททกนิกาย ธรรมบท ปุญฺญานิ ปรโลกสฺมึ ปติฏฺฐา โหนฺติ ปาณินํ. บุญเป็นที่พึ่งของสัตว์ในโลกหน้า. คัมภีร์ที่มา : ขุททกนิกาย ธรรมบท สานิ กมฺมานิ นยนฺติ ทุคฺคตึ. กรรมชั่วของตนเอง ย่อมนำไปสู่ทุคติ. คัมภีร์ที่มา : อังคุตตรนิกาย ติกนิบาต
Puññaṃ corehi dūharaṃ
पुण्य को चोर नहीं ले जा सकते।
(संयुत्तनिकाय, सगाथावग्ग 15/50)

อารัมภบทअब आरम्भ में उद्धृत धम्म-विषय के अर्थ की विस्तार से व्याख्या की जाएगी, ताकि वह अध्ययन और आचरण के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो।

อธิบายบทตั้งव्याख्या इस प्रकार है: "पुण्य" का अर्थ है वह शुभता जो दान देने, शील का पालन करने, भावना का अभ्यास करने और अन्य अच्छे कर्म करने से मन में उत्पन्न होती है। यह सूक्ति सिखाती है कि पुण्य ऐसा धन है जिसे चोर नहीं ले जा सकते। यह बाहरी धन, जैसे रुपये-पैसे, सोना, घर, गाड़ी और आभूषणों से भिन्न है, जो कभी भी चोरी हो सकते हैं, आग में जल सकते हैं, बाढ़ में बह सकते हैं या खो सकते हैं।

ขยายความบทตั้งजिस सुत्त से यह सूक्ति ली गई है, उसमें प्रश्न है: बुढ़ापे तक क्या अच्छा रहता है? क्या दृढ़ता से स्थापित होने पर अच्छा है? मनुष्यों का रत्न क्या है? और किसे चोर नहीं ले जा सकते? उत्तर है: शील बुढ़ापे तक अच्छा रहता है, श्रद्धा दृढ़ता से स्थापित होने पर अच्छी है, प्रज्ञा मनुष्यों का रत्न है और पुण्य को चोर नहीं ले जा सकते। चोर पुण्य को इसलिए नहीं ले जा सकते क्योंकि पुण्य किसी तिजोरी या बैंक में नहीं, बल्कि करने वाले के मन में रहता है। कोई उसमें हाथ डालकर उसे चुरा नहीं सकता, कोई प्राकृतिक आपदा उसे नष्ट नहीं कर सकती, और वह पुण्य करने वाले के साथ हर जगह जाता है, यहाँ तक कि एक भव से दूसरे भव तक और एक जन्म से दूसरे जन्म तक भी।

ประโยคสะพาน + ที่มา ๑जब कोई व्यक्ति जान लेता है कि मृत्यु के बाद कुछ भी साथ नहीं जाता, तो वह जीवित रहते हुए ही पुण्य करने में लगा रहता है, ताकि वह पुण्य आगे के जन्म में उसका सुखद आश्रय बने। यह संयुत्तनिकाय-सगाथावग्ग में आए बुद्धवचन के अनुरूप है:

อธิบายบทเชื่อม ๑व्याख्या इस प्रकार है: "आश्रय" का अर्थ है वह जो रक्षा करता है, सांत्वना देता है और संकट से बचने में सहायता करता है। "परलोक" का अर्थ है वह भव या लोक जिसमें प्राणी इस लोक में जीवन समाप्त होने के बाद जन्म लेते हैं। यह सूक्ति सिखाती है कि परलोक में पुण्य सभी प्राणियों का आश्रय होता है, अर्थात् इस लोक को छोड़ने के बाद न धन-संपत्ति, न सगे-संबंधी और न ही पद-प्रतिष्ठा साथ जा सकती है; केवल अपने किए हुए पुण्य और पाप ही साथ जाते हैं, और केवल पुण्य ही रक्षा कर सकता है।

อธิบายบทเชื่อม ๑इस लोक में मनुष्य के अनेक आश्रय होते हैं, जैसे माता-पिता संतान के आश्रय होते हैं, सगे-संबंधी और मित्र कठिन समय में आश्रय होते हैं, और धन-संपत्ति जीवन-यापन का आश्रय होती है। परंतु इन आश्रयों की सीमाएँ हैं; जब इस लोक से जाने का समय आता है, तो ये आश्रय साथ नहीं जा सकते। बुद्ध-शासन सिखाता है कि सभी प्राणी कर्म-स्वक हैं, कर्म के दायाद हैं; वे जो भी कर्म करते हैं, अच्छा या बुरा, उस कर्म का फल वे ही पाते हैं। इस लोक को छोड़ने के बाद केवल अपने किए हुए कर्म ही साथ जाते हैं। भली-भाँति किया गया पुण्य परलोक में पुण्य करने वाले का स्वागत करता है, जैसे सगे-संबंधी अपने उस प्रियजन का, जो बहुत समय पहले चला गया था, सकुशल घर लौटने पर प्रसन्नता से स्वागत करते हैं। इसलिए पुण्य ही परलोक में सच्चा आश्रय है।

ตัวอย่างในชีวิตवास्तविक जीवन में हम देखते हैं कि बहुत धन वाले कुछ लोग किसी दिन धोखाधड़ी, व्यवसाय के दिवालिया होने या किसी आपदा के कारण सब कुछ खो सकते हैं। परंतु उन्होंने जो भलाई की थी, जैसे दूसरों की सहायता, ईमानदारी और उदारता, वह लोगों की स्मृति में बनी रहती है और प्रायः कठिन समय में लोग उसकी सहायता के लिए हाथ बढ़ाते हैं। जिस विद्यार्थी ने सच्चे मन से अपने साथी की सहायता की थी, वह भलाई सदा उसी की रहती है; कोई उसे छीन नहीं सकता।

สรุปनिष्कर्ष यह है: जो सुरक्षित और स्थिर धन चाहता है, उसे केवल बाहरी धन इकट्ठा नहीं करना चाहिए, बल्कि सदा पुण्य का संचय करना चाहिए, क्योंकि पुण्य ही वह सच्चा धन है जो कभी नष्ट नहीं होता। यह आरम्भ में विषय के रूप में उद्धृत धम्म-वचन के अनुरूप है:

Puññaṃ corehi dūharaṃ
पुण्य को चोर नहीं ले जा सकते।

ปิดท้ายइस प्रकार ऊपर वर्णित रूप में इसका आशय स्पष्ट किया गया।

ข้อ ๓ · ข้อสอบสนามหลวง พ.ศ. ๒๕๖๖ ธรรมศึกษาชั้นตรี มัธยม · บทเชื่อม ๑ บท (เลือกจากที่โจทย์กำหนด) · ประมาณ ๖๕๕ คำ
โจทย์: สุโข ปุญฺญสฺส อุจฺจโย. การสั่งสมซึ่งบุญ นำสุขมาให้. แต่งอธิบายความให้สมเหตุสมผล โดยใช้สุภาษิตที่สนามหลวงแผนกธรรมกำหนดมาให้ จำนวน ๓ สุภาษิตข้างล่างนี้ มาประกอบอ้างอิงเพียง ๑ สุภาษิต และสุภาษิตที่อ้างมานั้น ควรอธิบายเชื่อมความให้ สมกับเรื่องในกระทู้ตั้ง ในชั้นนี้ กำหนดให้เขียนลงในกระดาษใบตอบตั้งแต่ ๒ หน้า (เว้นบรรทัด) ขึ้นไป สีลํ ยาว ชรา สาธุ. ศีลยังประโยชน์ให้สำเร็จตราบเท่าชรา. คัมภีร์ที่มา : สังยุตตนิกาย สคาถวรรค ปุญฺญานิ ปรโลกสฺมึ ปติฏฺฐา โหนฺติ ปาณินํ. บุญเป็นที่พึ่งของสัตว์ทั้งหลายในโลกหน้า. คัมภีร์ที่มา : อังคุตตรนิกาย ปัญจกนิบาต ทุกฺโข ปาปสฺส อุจฺจโย. การสั่งสมบาป นำทุกข์มาให้. คัมภีร์ที่มา : ขุททกนิกาย ธรรมบท
Sukho puññassa uccayo
पुण्य का संचय सुख लाता है।
(खुद्दकनिकाय, धम्मपद 25/30)

อารัมภบทअब आरम्भ में उद्धृत धम्म-विषय के अर्थ की विस्तार से व्याख्या की जाएगी, ताकि वह अध्ययन और आचरण के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो।

อธิบายบทตั้งव्याख्या इस प्रकार है: "पुण्य का संचय" का अर्थ है सदा भलाई करते रहना, उसे बार-बार दोहराना, यहाँ तक कि भलाई बढ़ती जाए और स्वभाव बन जाए। यह सूक्ति सिखाती है कि इस प्रकार पुण्य का संचय सुख लाता है। यह बुद्ध-वचन उस बुद्ध-वचन का विपरीत युग्म है कि पाप का संचय दुःख लाता है। इससे पता चलता है कि हम अपने जीवन में जो संचय करते हैं, वही निर्धारित करता है कि हमारा जीवन सुखमय होगा या दुःखमय।

ขยายความบทตั้งधम्मपद में भगवान बुद्ध ने कहा है कि यदि कोई पुरुष पुण्य करे, तो उसे वह पुण्य बार-बार करना चाहिए और उस पुण्य में रुचि उत्पन्न करनी चाहिए, क्योंकि पुण्य का संचय सुख लाता है। एक अन्य स्थान पर उन्होंने कहा है कि पुण्य को छोटा समझकर यह नहीं सोचना चाहिए कि इसका कोई फल नहीं होगा, क्योंकि पानी का घड़ा एक-एक बूँद टपकने से भी भर जाता है; प्रज्ञावान व्यक्ति थोड़ा-थोड़ा पुण्य संचित करके भी पुण्य से भर जाता है। इसलिए नियमित रूप से की गई छोटी-छोटी भलाई कभी-कभार की गई बड़ी भलाई से अधिक शक्तिशाली होती है।

ประโยคสะพาน + ที่มา ๑इस लोक को छोड़ने के बाद धन-सम्पत्ति, सगे-सम्बन्धी और मान-प्रतिष्ठा साथ नहीं जा सकते। परलोक में प्राणियों का आश्रय और रक्षक केवल पुण्य ही है। यह संयुत्तनिकाय-सगाथावग्ग में आए बुद्धवचन के अनुरूप है:

อธิบายบทเชื่อม ๑व्याख्या इस प्रकार है: "आश्रय" का अर्थ है वह जो रक्षा करता है, सांत्वना देता है और संकट से बचने में सहायता करता है। "परलोक" का अर्थ है वह भव या लोक जिसमें प्राणी इस लोक में जीवन समाप्त होने के बाद जन्म लेते हैं। यह सूक्ति सिखाती है कि परलोक में पुण्य सभी प्राणियों का आश्रय होता है, अर्थात् इस लोक को छोड़ने के बाद न धन-संपत्ति, न सगे-संबंधी और न ही पद-प्रतिष्ठा साथ जा सकती है; केवल अपने किए हुए पुण्य और पाप ही साथ जाते हैं, और केवल पुण्य ही रक्षा कर सकता है।

อธิบายบทเชื่อม ๑इस लोक में मनुष्य के अनेक आश्रय होते हैं, जैसे माता-पिता संतान के आश्रय होते हैं, सगे-संबंधी और मित्र कठिन समय में आश्रय होते हैं, और धन-संपत्ति जीवन-यापन का आश्रय होती है। परंतु इन आश्रयों की सीमाएँ हैं; जब इस लोक से जाने का समय आता है, तो ये आश्रय साथ नहीं जा सकते। बुद्ध-शासन सिखाता है कि सभी प्राणी कर्म-स्वक हैं, कर्म के दायाद हैं; वे जो भी कर्म करते हैं, अच्छा या बुरा, उस कर्म का फल वे ही पाते हैं। इस लोक को छोड़ने के बाद केवल अपने किए हुए कर्म ही साथ जाते हैं। भली-भाँति किया गया पुण्य परलोक में पुण्य करने वाले का स्वागत करता है, जैसे सगे-संबंधी अपने उस प्रियजन का, जो बहुत समय पहले चला गया था, सकुशल घर लौटने पर प्रसन्नता से स्वागत करते हैं। इसलिए पुण्य ही परलोक में सच्चा आश्रय है।

ตัวอย่างในชีวิตवास्तविक जीवन में, जो व्यक्ति प्रतिदिन सुबह उठकर पिण्डपात देता है, सोने से पहले वन्दना-पाठ करता है और दूसरों की सहायता करने में तत्पर रहता है, भले ही वह प्रतिदिन थोड़ा ही करे, कई वर्ष बीतने पर उसका मन निर्मल और सुखी होता है और वह लोगों का प्रिय होता है। जो विद्यार्थी प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा पाठ दोहराता है, उसका ज्ञान उस विद्यार्थी से अधिक दृढ़ होता है जो केवल परीक्षा से पहले की रात कड़ी पढ़ाई करता है। भलाई का संचय भी इसी प्रकार होता है।

สรุปनिष्कर्ष यह है: जो स्थायी सुख चाहता है, उसे प्रतिदिन परिश्रम से भलाई करनी चाहिए, छोटी या बड़ी का भेद किए बिना और किसी विशेष अवसर की प्रतीक्षा किए बिना, क्योंकि संचित भलाई जीवन भर के सुख का आधार बनती है। यह आरम्भ में विषय के रूप में उद्धृत धम्म-वचन के अनुरूप है:

Sukho puññassa uccayo
पुण्य का संचय सुख लाता है।

ปิดท้ายइस प्रकार ऊपर वर्णित रूप में इसका आशय स्पष्ट किया गया।

ข้อ ๔ · ข้อสอบสนามหลวง พ.ศ. ๒๕๖๕ ธรรมศึกษาชั้นตรี มัธยม · บทเชื่อม ๑ บท (เลือกจากที่โจทย์กำหนด) · ประมาณ ๘๙๒ คำ
โจทย์: ศีลเป็นเยี่ยมในโลก แต่งอธิบายให้สมเหตุสมผล โดยใช้สุภาษิตที่สนามหลวงแผนกธรรมกำหนดมาให้ จำนวน ๓ สุภาษิตข้างล่างนี้ มาประกอบอ้างอิงเพียง ๑ สุภาษิต และสุภาษิตที่อ้างมานั้น ควรอธิบายเชื่อมความให้ สมกับเรื่องในกระทู้ตั้ง ในชั้นนี้ กำหนดให้เขียนลงในกระดาษใบตอบตัังแต่ ๒ หน้า (เว้นบรรทัด) ขึ้นไป สีลํ ยาว ชรา สาธุ. ศีลยังประโยชน์ให้สำเร็จตราบเท่าชรา คัมภีร์ที่มา : สังยุตต นิกาย สคาถวรรค สุโข ปุญฺญสฺส อุจฺจโย. ความสั่งสมขึ้นซึ่งบุญ นำสุขมาให้ คัมภีร์ที่มา : ขุททกนิกาย ธรรมบท กมฺมุนา วตฺตตี โลโก. สัตวโลกย่อมเป็นไปตามกรรม คัมภีร์ที่มา : ขุททกนิกาย ธรรมบท
Sīlaṃ loke anuttaraṃ
शील संसार में सर्वोत्तम है।
(खुद्दकनिकाय, जातक, एकनिपात 27/28)

อารัมภบทअब आरम्भ में उद्धृत धम्म-विषय के अर्थ की विस्तार से व्याख्या की जाएगी, ताकि वह अध्ययन और आचरण के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो।

อธิบายบทตั้งव्याख्या इस प्रकार है: यह सूक्ति शील की श्रेष्ठता की प्रशंसा करती है। "अनुत्तर" का अर्थ है सर्वोच्च, जिससे ऊँचा कुछ नहीं। इस संदर्भ में यह अच्छे आचरण को महत्त्वपूर्ण और आदरणीय बताती है, क्योंकि शील शरीर और वाणी के संयम में, दूसरों को हानि न पहुँचाने में सहायता करता है और शांतिपूर्ण सहजीवन की आवश्यक नींव है।

ขยายความบทตั้งशील समाज के लिए मूल्यवान है क्योंकि वह कठिनाई उत्पन्न करने वाले कर्मों को रोकता है। जब लोग हत्या और एक-दूसरे को चोट पहुँचाने, चोरी, काम-मिथ्याचार, झूठ और प्रमाद का कारण बनने वाले नशे से बचते हैं, तो संघर्ष और हानि के कारण घटते हैं और साथ रहने में विश्वास बढ़ता है। इसलिए शील-पालन केवल निजी मामला नहीं, बल्कि सबकी शांति के प्रति ज़िम्मेदारी भी है।

ขยายความบทตั้งसहजीवन के लाभ के अतिरिक्त, शील मन के प्रशिक्षण और प्रज्ञा के विकास को सहारा देने वाली नींव भी है। शील-पालन करने वाले के पास अपनी भूलों से व्याकुल न होने का कारण होता है। यह पछतावे से मुक्ति मन को समाधि के अभ्यास के लिए तैयार होने में सहायता करती है, और जब मन स्थिर होता है, तो वह वस्तुओं को यथार्थ रूप में सावधानी और सही ढंग से देखने में सहायक होता है। इसके लिए अध्ययन, अभ्यास और सही चिंतन भी चाहिए। इस प्रकार शील, समाधि और प्रज्ञा जीवन के विकास में एक-दूसरे को सहारा देने वाले गुण हैं।

ขยายความบทตั้งसीलवीमंसन जातक और उसकी अट्ठकथा में एक विषैले साँप की शीलवान कहकर प्रशंसा की गई है, क्योंकि वह किसी को डसता या हानि नहीं पहुँचाता। यह कथा अहानि के गुण से शील का मूल्य दिखाती है: जिस प्राणी से लोग डरते हैं, वह भी दूसरों को हानि न पहुँचाए तो प्रशंसा पाता है। इसलिए मनुष्यों को अपने आचरण के संयम का महत्त्व समझना चाहिए और अपनी शक्ति या योग्यता का उपयोग किसी के लिए कठिनाई उत्पन्न करने में नहीं करना चाहिए।

ประโยคสะพาน + ที่มา ๑जब व्यक्ति दृढ़ता से शील की रक्षा करता है, तो वृद्धावस्था में, जब अन्य सब कुछ क्षीण हो जाता है, तब भी शील ऐसा गुण बना रहता है जो जीवन को लाभ और गरिमा प्रदान करता है। यह संयुत्तनिकाय-सगाथावग्ग में आए बुद्धवचन के अनुरूप है:

อธิบายบทเชื่อม ๑व्याख्या इस प्रकार है: "शील" का अर्थ है सदाचार, काया और वाणी को भली-भाँति संयत रखना, और दोषपूर्ण कर्मों तथा वचनों से विरत रहना। "बुढ़ापे तक" का अर्थ है वृद्धावस्था आने तक। सूक्ति "सीलं याव जरा साधु", जिसका अर्थ है "शील बुढ़ापे तक हित सिद्ध करता है।", यह दिखाती है कि शील जीवन की हर अवस्था में मूल्यवान और सहायक है; चाहे बालक हो, वयस्क हो या वृद्ध, शील का पालन करना सदा अच्छा है और लाभ उत्पन्न करता है।

อธิบายบทเชื่อม ๑संयुत्तनिकाय के सगाथवग्ग के जरासुत्त में एक देवता ने भगवान बुद्ध से पूछा कि कौन-सी वस्तु बुढ़ापे तक हित सिद्ध करती है, और भगवान ने उत्तर दिया कि वह शील है। अट्ठकथा इस बात की व्याख्या बाहरी आभूषणों से तुलना करके करती है, यह दिखाने के लिए कि शील ऐसा सौंदर्य है जो हर आयु के व्यक्ति को शोभा देता है, चाहे बचपन हो, मध्य आयु हो या वृद्धावस्था। यद्यपि शरीर का सौंदर्य और बल समय के साथ बदल जाते हैं, परंतु सदाचार का मूल्य केवल इस कारण कम नहीं होता कि व्यक्ति की आयु बढ़ गई है। इसलिए शील का पालन करने वाला व्यक्ति वृद्धावस्था तक अपनी भलाई को बनाए रख सकता है।

อธิบายบทเชื่อม ๑शील का लाभ केवल दूसरों का प्रेम या प्रशंसा पाने में ही नहीं है, बल्कि इसमें भी है कि वह दूसरों को सताने, बेईमानी करने और असत्य बोलने से उत्पन्न होने वाले कष्ट को जन्म नहीं देता। शील का पालन करने वाले के पास अपने आचरण का स्मरण करके प्रसन्न रहने का कारण होता है। इसके अतिरिक्त, ईमानदारी और एक-दूसरे का अनुचित लाभ न उठाना साथ रहने में विश्वास भी उत्पन्न करते हैं। इसलिए निरंतर शील का पालन करना सदाचार को और दृढ़ बनाने का अभ्यास है, जो स्वयं का और समाज दोनों का हित करता है।

ตัวอย่างในชีวิตदैनिक जीवन में, जिस समुदाय के लोग ईमानदार हैं और एक-दूसरे की चोरी नहीं करते या हानि नहीं पहुँचाते, उसमें सुरक्षा और सुखद जीवन की अच्छी नींव होती है। जो कामकाजी लोग भ्रष्टाचार नहीं करते और धोखा नहीं देते, वे साथ काम करने में विश्वास बनाने में सहायता करते हैं। जो विद्यार्थी बिना अनुमति सहपाठियों की चीज़ें नहीं लेते, झूठ नहीं बोलते और दूसरों को तंग नहीं करते, वे कक्षा को ऐसी जगह बनाने में सहायता करते हैं जहाँ सब आराम से साथ रह सकें। ये उदाहरण दिखाते हैं कि शील का मूल्य हर आयु के लोगों के जीवन में दिखाई देता है।

สรุปनिष्कर्ष यह है: जो अच्छी तरह जीना चाहता है, उसे मन और प्रज्ञा के विकास के साथ अपने शील को दृढ़ रखना चाहिए, और उचित वचनों तथा अच्छे आदर्श से दूसरों को भी अहानि का लाभ देखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। जब हर व्यक्ति अपने आचरण की ज़िम्मेदारी लेता है, तो वह शांतिपूर्ण समाज को सहारा देता है। स्वयं और सबके लिए यह हित शील की श्रेष्ठता दिखाता है। यह आरम्भ में विषय के रूप में उद्धृत धम्म-वचन के अनुरूप है:

Sīlaṃ loke anuttaraṃ
शील संसार में सर्वोत्तम है।

ปิดท้ายइस प्रकार ऊपर वर्णित रूप में इसका आशय स्पष्ट किया गया।

ข้อ ๕ · ข้อสอบสนามหลวง พ.ศ. ๒๕๖๓ ธรรมศึกษาชั้นตรี มัธยม · บทเชื่อม ๑ บท (เลือกจากที่โจทย์กำหนด) · ประมาณ ๗๑๗ คำ
โจทย์: บุญเป็นที่พึ่งของสัตว์ทั้งหลายในโลกเบื้องหน้า ........................................................... แต่งอธิบายให้สมเหตุสมผล โดยอ้างสุภาษิตที่สนามหลวงแผนกธรรมกำหนดให้ จำนวน ๓ สุภาษิตนี้ มาประกอบ ๑ สุภาษิต และสุภาษิตที่อ้างมานั้น ควรอธิบายเรียงเชื่อมความให้ ติดต่อสมเรื่องกับกระทู้ตั้ง ในชั้นนี้ กำหนดให้เขียนลงในใบคำตอบ ตั้งแต่ ๒ หน่า(เว้นบรรทัด)ขึ้นไป ให้ เวลา ๓ ชั่วโมง ปาปานํ อกรณํ สุขํ การไม่ทำบาป นำสุขมาให้. ที่มาสุตตันตปิฎก ขุททกนิกาย ธัมมบท กมฺมุนา วตฺตตี โลโก. สัตว์โลกย่อมเป็นไปตามกรรม. ที่มาสุตตันตปิฎก ขุททกนิกาย ธัมมบท ปุญฺญํ โจเรหิ ทูหรํ. บุญอันโจรนำไปไม่ได้. ที่มาสุตตันตปิฎก ขุททกนิกาย ธัมมบท
Puññāni paralokasmiṃPatiṭṭhā honti pāṇinaṃ
पुण्य परलोक में प्राणियों का आश्रय है।
(संयुत्तनिकाय, सगाथावग्ग 15/26)

อารัมภบทअब आरम्भ में उद्धृत धम्म-विषय के अर्थ की विस्तार से व्याख्या की जाएगी, ताकि वह अध्ययन और आचरण के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो।

อธิบายบทตั้งव्याख्या इस प्रकार है: "आश्रय" का अर्थ है वह जो रक्षा करता है, सांत्वना देता है और संकट से बचने में सहायता करता है। "परलोक" का अर्थ है वह भव या लोक जिसमें प्राणी इस लोक में जीवन समाप्त होने के बाद जन्म लेते हैं। यह सूक्ति सिखाती है कि परलोक में पुण्य सभी प्राणियों का आश्रय होता है, अर्थात् इस लोक को छोड़ने के बाद न धन-संपत्ति, न सगे-संबंधी और न ही पद-प्रतिष्ठा साथ जा सकती है; केवल अपने किए हुए पुण्य और पाप ही साथ जाते हैं, और केवल पुण्य ही रक्षा कर सकता है।

ขยายความบทตั้งइस लोक में मनुष्य के अनेक आश्रय होते हैं, जैसे माता-पिता संतान के आश्रय होते हैं, सगे-संबंधी और मित्र कठिन समय में आश्रय होते हैं, और धन-संपत्ति जीवन-यापन का आश्रय होती है। परंतु इन आश्रयों की सीमाएँ हैं; जब इस लोक से जाने का समय आता है, तो ये आश्रय साथ नहीं जा सकते। बुद्ध-शासन सिखाता है कि सभी प्राणी कर्म-स्वक हैं, कर्म के दायाद हैं; वे जो भी कर्म करते हैं, अच्छा या बुरा, उस कर्म का फल वे ही पाते हैं। इस लोक को छोड़ने के बाद केवल अपने किए हुए कर्म ही साथ जाते हैं। भली-भाँति किया गया पुण्य परलोक में पुण्य करने वाले का स्वागत करता है, जैसे सगे-संबंधी अपने उस प्रियजन का, जो बहुत समय पहले चला गया था, सकुशल घर लौटने पर प्रसन्नता से स्वागत करते हैं। इसलिए पुण्य ही परलोक में सच्चा आश्रय है।

ประโยคสะพาน + ที่มา ๑बाहरी धन कभी भी चोरी हो सकता है या खो सकता है, किन्तु पुण्य, अर्थात् मन में उत्पन्न भलाई, ऐसा धन है जिसे चोर नहीं ले जा सकते। इसलिए वह कहीं अधिक स्थिर सम्पत्ति है। यह संयुत्तनिकाय-सगाथावग्ग में आए बुद्धवचन के अनुरूप है:

อธิบายบทเชื่อม ๑व्याख्या इस प्रकार है: "पुण्य" का अर्थ है वह शुभता जो दान देने, शील का पालन करने, भावना का अभ्यास करने और अन्य अच्छे कर्म करने से मन में उत्पन्न होती है। यह सूक्ति सिखाती है कि पुण्य ऐसा धन है जिसे चोर नहीं ले जा सकते। यह बाहरी धन, जैसे रुपये-पैसे, सोना, घर, गाड़ी और आभूषणों से भिन्न है, जो कभी भी चोरी हो सकते हैं, आग में जल सकते हैं, बाढ़ में बह सकते हैं या खो सकते हैं।

อธิบายบทเชื่อม ๑जिस सुत्त से यह सूक्ति ली गई है, उसमें प्रश्न है: बुढ़ापे तक क्या अच्छा रहता है? क्या दृढ़ता से स्थापित होने पर अच्छा है? मनुष्यों का रत्न क्या है? और किसे चोर नहीं ले जा सकते? उत्तर है: शील बुढ़ापे तक अच्छा रहता है, श्रद्धा दृढ़ता से स्थापित होने पर अच्छी है, प्रज्ञा मनुष्यों का रत्न है और पुण्य को चोर नहीं ले जा सकते। चोर पुण्य को इसलिए नहीं ले जा सकते क्योंकि पुण्य किसी तिजोरी या बैंक में नहीं, बल्कि करने वाले के मन में रहता है। कोई उसमें हाथ डालकर उसे चुरा नहीं सकता, कोई प्राकृतिक आपदा उसे नष्ट नहीं कर सकती, और वह पुण्य करने वाले के साथ हर जगह जाता है, यहाँ तक कि एक भव से दूसरे भव तक और एक जन्म से दूसरे जन्म तक भी।

ตัวอย่างในชีวิตवास्तविक जीवन में, जो व्यक्ति विदेश यात्रा पर जाता है, उसे पहले से पाथेय और धन तैयार रखना पड़ता है, अन्यथा वहाँ पहुँचने पर उसे कठिनाई होती है। परलोक की यात्रा भी ऐसी ही है; पुण्य वह पाथेय है जिसे तैयार रखना आवश्यक है। जो व्यक्ति प्रमाद में जीवन बिताता है और कभी भलाई नहीं करता, यात्रा का समय आने पर उसके पास कोई पाथेय नहीं होता। परंतु जिसने बहुत पुण्य किया है, वह निश्चिंत मन से यात्रा करता है, उस व्यक्ति के समान जिसका स्वागत करने के लिए गंतव्य पर सगे-संबंधी प्रतीक्षा कर रहे हों।

สรุปनिष्कर्ष यह है: जो जीवन के सत्य को समझता है, उसे प्रमाद नहीं करना चाहिए और अवसर रहते ही पुण्य करके परलोक के लिए आश्रय तैयार करना चाहिए, दान देकर, शील का पालन करके और चित्त को निर्मल बनाने का अभ्यास करके। यह आरम्भ में विषय के रूप में उद्धृत धम्म-वचन के अनुरूप है:

Puññāni paralokasmiṃPatiṭṭhā honti pāṇinaṃ
पुण्य परलोक में प्राणियों का आश्रय है।

ปิดท้ายइस प्रकार ऊपर वर्णित रूप में इसका आशय स्पष्ट किया गया।