พุทธศาสนสุภาษิต

สำหรับวิชากระทู้ธรรม — บาลี คำแปล คัมภีร์ที่มา และคำอธิบายความหมาย เพื่อใช้ศึกษาและเป็นแบบอย่างในการแต่งกระทู้ธรรม

คำอธิบายเป็นเพียงตัวอย่างการตีความ ไม่ใช่เฉลย — ใช้เป็นแนวทางเบื้องต้น และควรศึกษาเพิ่มเติมจากพระไตรปิฎกและคัมภีร์อื่น ๆ

ธรรมศึกษา (ต่างประเทศ)
ธรรมศึกษาชั้นตรี (ต่างประเทศ) · หลักสูตรฉบับปรับปรุง ๒๕๕๗ · ๔๓ บท · มีคำอธิบายแล้ว ๔๓ บท
ทานวรรค — หมวดทาน ๑๓ บท
कहा जाता है कि दान और युद्ध समान हैं।
สํ. ส. ๑๕/๒๙. ขุ. ชา. อฏฺฐก. ๒๗/๒๔๙.
जब चित्त श्रद्धा से भर जाता है, तो कोई भी दान छोटा नहीं कहलाता।
ขุ. วิมาน. ๒๖/๘๒.
विवेकपूर्वक दान देना सुगत द्वारा प्रशंसित है।
สํ. ส. ๑๕/๓๐. ขุ. ชา. อฏฺฐก. ๒๗/๒๔๙. เปต. ๒๖/๑๙๗.
केवल मूर्ख ही दान की प्रशंसा नहीं करते।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๘.
दाता मित्रता को बाँध लेता है।
สํ. ส. ๑๕/๓๑๖.
दाता प्रिय होता है; बहुत से लोग उसकी संगति करते हैं।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๔๓.
दाता प्रिय होता है।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๔๔.
सुख देने वाला ज्ञानी स्वयं सुख पाता है।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๔๕.
जो मनभावन वस्तु देता है, वह मनभावन वस्तु पाता है।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๕๕.
जो श्रेष्ठ वस्तु देता है, वह श्रेष्ठ पद को प्राप्त होता है।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๕๖.
जो सर्वोत्तम देता है, वह पुनः सर्वोत्तम पाता है।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๕๖.
देने से पुण्य बढ़ता है।
ที. มหา. ๑๐/๑๕๘. ขุ. อุ. ๒๕/๒๑๕.
मनुष्य को वही देना चाहिए जो देने योग्य हो।
ขุ. ชา. สตฺตก. ๒๗/๒๑๗.
ปาปวรรค — หมวดบาป ๑๓ บท
पाप-धर्म सचमुच मल हैं, इस लोक में भी और परलोक में भी।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๑๙๘. ขุ. ธ. ๒๕/๔๗.
पाप का संचय दुःख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๐.
पाप न करना सुख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๙.
दुष्ट के लिए पाप करना सरल है।
วิ. จุล. ๗/๑๙๕. ขุ. อุ. ๒๕/๑๖๘.
शुद्ध व्यक्ति पाप में आनन्द नहीं लेता।
วิ. มหา. ๕/๓๔. ขุ. อุ. ๒๕/๑๖๖.
पाप-स्वभाव वाला व्यक्ति अपने ही कर्मों से दुःख पाता है।
ม. ม. ๑๓/๔๑๓. ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๙.
सज्जन तप के द्वारा पापकर्म का त्याग करते हैं।
ขุ. ชา. อฏฺฐก. ๒๗/๒๔๕.
लोग मोह के कारण पापकर्म करते हैं।
ม. ม. ๑๓/๔๑๓. ขุ. ชา. ปกิณฺณก. ๒๗/๓๘๐.
जो पाप नहीं करता, उसके लिए पाप नहीं है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๑.
जब मैं धर्म कह रहा होता हूँ, पाप मुझे नहीं लगता।
ขุ. ชา. สตฺตก. ๒๗/๒๒๔.
कोई ऐसा पाप नहीं जिसे झूठ बोलने वाला न करे।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๘. ขุ. อิติ. ๒๕/๒๔๓.
सब पापों से बचना चाहिए।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๑.
भोजन के लिए भी पाप नहीं करना चाहिए।
นัย-ขุ. ชา. นวก. ๒๗/๒๖๒.
ปุญญวรรค — หมวดบุญ ๕ บท
पुण्य को चोर नहीं ले जा सकते।
สํ. ส. ๑๕/๕๐.
पुण्य जीवन के अन्त में सुख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๙.
पुण्य का संचय सुख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๐.
पुण्य परलोक में प्राणियों का आश्रय है।
สํ. ส. ๑๕/๒๖. องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๔๔. ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๙๔.
सुख देने वाले पुण्यकर्म करने चाहिए।
สํ. ส. ๑๕/๓. องฺ. ติก. ๒๐/๑๙๘.
สติวรรค — หมวดสติ ๔ บท
स्मृति ही संसार में जागृति का धर्म है।
สํ. ส. ๑๕/๖๑.
स्मृतिमान व्यक्ति सदा उन्नति करता है।
สํ. ส. ๑๕/๓๐๖.
स्मृतिमान व्यक्ति सुख पाता है।
สํ. ส. ๑๕/๓๐๖.
स्मृतिमान व्यक्ति दिन-प्रतिदिन श्रेष्ठ होता जाता है।
สํ. ส. ๑๕/๓๐๖.
สีลวรรค — หมวดศีล ๘ บท
शील वृद्धावस्था तक हित सिद्ध करता है।
สํ. ส. ๑๕/๕๐.
शील वृद्धावस्था तक सुख देता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๙.
कहा जाता है कि शील ही कल्याण है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๙.
शील संसार में सर्वोत्तम है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๘.
शील साथ रहने से जाना जाता है।
นัย-ขุ. อุ. ๒๕/๑๗๘.
सर्वत्र संयम अच्छा है।
สํ. ส. ๑๕/๑๐๖. ขุ. ธ. ๒๕/๖๔.
जो सावधान रहता है, उसका वैर नहीं बढ़ता।
ที. มหา. ๑๐/๑๕๙. ขุ. อุ. ๒๕/๒๑๕.
ज्ञानी को शील की रक्षा करनी चाहिए।
ขุ. อิติ. ๒๕/๒๘๒.
บาลีอักษรโรมันถอดจากอักษรไทยโดยอัตโนมัติ · คำอธิบายแสดงเฉพาะบทที่ผ่านการตรวจทานแล้ว
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