พุทธศาสนสุภาษิต

สำหรับวิชากระทู้ธรรม — บาลี คำแปล คัมภีร์ที่มา และคำอธิบายความหมาย เพื่อใช้ศึกษาและเป็นแบบอย่างในการแต่งกระทู้ธรรม

คำอธิบายเป็นเพียงตัวอย่างการตีความ ไม่ใช่เฉลย — ใช้เป็นแนวทางเบื้องต้น และควรศึกษาเพิ่มเติมจากพระไตรปิฎกและคัมภีร์อื่น ๆ

ธรรมศึกษา (ต่างประเทศ)
นักธรรมชั้นตรี · พุทธศาสนสุภาษิต เล่ม ๑ · ๕๐๐ บท · มีคำอธิบายแล้ว ๕๘ บท
อัตตวรรค — หมวดตน ๒๘ บท
अपने को जीतना ही श्रेष्ठ है।
ขุ. ธ. ๒๕/๒๙.
कहते हैं, अपने आप को वश में करना कठिन है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๖.
सुदान्त आत्मा मनुष्य का प्रकाश है।
สํ. ส. ๑๕/๒๔๘.
अपना आप ही अपना सहारा है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๖,๖๖.
अपना आप ही अपनी गति है।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๖.
अपना आप ही सबसे प्रिय है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๙.
अपने समान प्रेम (अन्य) कोई नहीं।
สํ. ส. ๑๕/๙.
अपने से ही पाप किया जाता है, अपने से ही मनुष्य मलिन होता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๗. ขุ. มหา. ๒๙/๓๗. ขุ. จู. ๓๐/๑๑๖.
अपने से ही पाप नहीं किया जाता, अपने से ही मनुष्य शुद्ध होता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๗. ขุ. มหา. ๒๙/๓๗. ขุ. จู. ๓๐/๑๑๖.
केवल अपना स्वार्थ देखने वाले मनुष्य अशुद्ध होते हैं।
ขุ. สุ. ๒๕๑๓๓๙.
पण्डित अपने को वश में करते हैं।
ม. ม. ๑๓/๔๘๗. ขุ. ธ. ๒๕/๒๕. ขุ. เถร. ๒๖/๓๘๙.
सुव्रत लोग अपने को वश में करते हैं।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๔.
जिसने अपने को भली-भाँति वश में किया है, वह दुर्लभ आश्रय पाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๖.
जो अपनी रक्षा करता है, उसका बाहरी भी रक्षित हो जाता है।
องฺ. ฉกฺก. ๒๒/๔๑๗.
यदि जाने कि अपना आप प्रिय है, तो अपनी भली-भाँति रक्षा करे।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๖.
पण्डित अपने को चित्त के मलों से निर्मल करे।
สํ. มหา. ๑๙/๒๙. ขุ. ธ. ๒๕/๒๖.
जैसे दूसरों को सिखाए, वैसे ही स्वयं करे।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๖.
अपने से अपने को चेतावनी दो।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๖.
अपने से अपनी परीक्षा करो।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๖.
अपने को दलदल से निकालो, जैसे कीचड़ में फँसा हाथी स्वयं को निकाल लेता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๘.
अपनी रक्षा करो, कष्ट में मत पड़ो।
ขุ. ชา. ปกิณฺณก. ๒๗/๓๗๒.
अपने को नष्ट मत करो।
ขุ. ชา. มหา. ๒๘/๒๗๙.
पुरुष अपने आप को दे न डाले।
สํ. ส. ๑๕/๖๐.
पुरुष अपने आप को त्याग न दे।
สํ. ส. ๑๕/๖๐.
अपने आप को भूलना नहीं चाहिए।
ขุ. ชา. ตึส. ๒๗/๕๐๓.
दूसरों के हित के लिए, चाहे वह कितना ही बड़ा हो, अपने हित की उपेक्षा न करे।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๗.
यदि जाने कि अपना आप प्रिय है, तो अपने को पाप से न जोड़े।
สํ. ส. ๑๕/๑๐๔.
जिस कारण से अपनी निन्दा हो, वह काम न करे।
ขุ. ส. ๒๕/๔๘๖.
อัปปมาทวรรค — หมวดไม่ประมาท ๙ บท
अप्रमाद अमृत का मार्ग है।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๘. ขุ. ชา. ตึส. ๒๗/๕๒๔.
ज्ञानी अप्रमाद को श्रेष्ठ धन के समान सँभालकर रखता है।
ม. ม. ๑๓/๔๘๘. สํ. ส. ๑๕/๓๖. ขุ. ธ. ๒๕/๑๘. ขุ. เถร. ๒๖/๓๙๐.
पण्डित अप्रमाद की प्रशंसा करते हैं।
สํ. ส. ๑๕/๑๒๖. องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๕๓. ขุ. ธ. ๒๕/๑๙. ขุ. อิติ. ๒๕/๒๔๒.
पण्डित अप्रमाद में आनन्दित होते हैं।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๘.
अप्रमत्त लोग मरते नहीं।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๘. ขุ. ชา. ตึส. ๒๗/๕๒๔.
अप्रमत्त होकर विचार करने वाला विपुल सुख को प्राप्त होता है।
ม. ม. ๑๓/๔๘๘. สํ. ส. ๑๕/๓๖. ขุ. ธ. ๒๕/๑๘. ขุ. เถร. ๒๖/๓๙๐.
अप्रमत्त पण्डित दोनों प्रयोजनों को पा लेता है।
สํ. ส. ๑๕/๑๒๖. องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๕๓. ขุ. อิติ. ๒๕/๒๔๒.
अप्रमाद को सम्पन्न करो।
ที. มหา. ๑๐/๑๘๐. สํ. ส. ๑๕/๒๓๑.
अप्रमाद में रत रहो।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๘.
กัมมวรรค — หมวดกรรม ๒๕ บท
कर्म प्राणियों को हीन और प्रणीत में विभक्त करता है।
ม. อุป. ๑๔/๓๘๕.
शिथिलता से किया गया कोई भी काम महान फल नहीं देता।
นัย-สํ. ส. ๑๕/๖๘.
अपने ही पापकर्म दुर्गति में ले जाते हैं।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๗.
सज्जन के लिए सत्कर्म करना सरल है।
วิ. จุล. ๗/๑๙๕. ขุ. อุ. ๒๕/๑๖๗.
दुर्जन के लिए सत्कर्म करना कठिन है।
วิ. จุล. ๗/๑๙๕. ขุ. อุ. ๒๕/๑๖๗.
पाप न ही करना अच्छा है।
สํ. ส. ๑๕/๖๘. ขุ. ธ. ๒๕/๕๖.
पाप बाद में जलाता है।
สํ. ส. ๑๕/๖๘. ขุ. ธ. ๒๕/๕๖.
सत्कर्म कर लेना ही अच्छा है।
สํ. ส. ๑๕/๖๘. ขุ. ธ. ๒๕/๕๖.
जिस कर्म को करके बाद में पछतावा हो, वह कर्म अच्छा नहीं।
สํ. ส. ๑๕/๘๑. ขุ. ธ. ๒๕/๒๓.
जिस कर्म को करके बाद में पछतावा न हो, वही कर्म अच्छा है।
สํ. ส. ๑๕/๘๑. ขุ. ธ. ๒๕/๒๓.
जो बुरा और अपने लिए अहितकर है, वह करना आसान है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๗.
जो हितकर भी हो और अच्छा भी, वह करना अत्यन्त कठिन है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๗.
पाप करने वाले को सुख सहज नहीं मिलता।
สํ. ส. ๑๕/๑๐๔.
अच्छा करो, अच्छा पाओ; बुरा करो, बुरा पाओ।
สํ. ส. ๑๕/๓๓๓. ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๘๔.
प्राणी-लोक कर्म के अनुसार चलता है।
ม. ม. ๑๓/๖๔๘. ขุ. สุ. ๒๕/๔๕๗.
पहले विचार करके फिर करना अच्छा है।
ว. ว.
जो हो गया, वह लौटाया नहीं जा सकता।
ส. ส.
जो अपने लिए हितकर है, यह जानकर उसे तुरन्त करे।
สํ. ส. ๑๕/๘๑.
यदि करना है, तो उसे (सचमुच) करे।
สํ. ส. ๑๕/๖๗. ขุ. ธ. ๒๕๑๕๖.
हितैषी के वचन के अनुसार करना चाहिए।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๗๒.
काम को उचित समय पर ही करना चाहिए।
ว. ว.
अपनी अच्छाई को वैसे ही बनाए रखे, जैसे नमक अपना खारापन बनाए रखता है।
ส. ส.
सहायता करने वाले का काम करना चाहिए।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๘๔.
विनाश चाहने वाले का उपकार नहीं करना चाहिए।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๘๔.
सदोष कर्म तक मत पहुँचो।
ส. ฉ.
กิเลสวรรค — หมวดกิเลส ๑๗ บท
संकल्प से उत्पन्न राग ही मनुष्य का काम है।
สํ. ส. ๑๕/๓๒. อง. ฉกฺก. ๒๒/๔๖๐.
मनुष्यों में स्थायी काम नहीं होते।
สํ. ส. ๑๕/๓๑.
संसार में कामों से तृप्ति नहीं होती।
ม. ม. ๑๓/๔๑๒. ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๗.
कार्षापणों की वर्षा से भी कामों में तृप्ति नहीं होती।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๐. ขุ. ชา. ติก. ๒๗/๑๐๒.
काम से बढ़कर (अन्य) कोई दुःख नहीं।
ขุ. ชา. เอกาทสก. ๒๗/๓๑๕.
तृष्णा के समान नदी कोई नहीं।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๘.
संसार में इच्छा का त्याग कठिन है।
สํ. ส. ๑๕/๖๑.
इच्छा के विषयों का कोई अन्त नहीं।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๙๔.
इच्छा मनुष्यों को धकेलती है।
สํ. ส. ๑๕/๖๑.
राग के समान आग कोई नहीं।
ขุ. ธ. ๒๕-๔๒,๔๘.
लोभ धर्मों के लिए अन्तराय है।
สํ. ส. ๑๕/๕๙.
अतिलोभ सचमुच पाप है।
วิ. ภิ. ๓/๙๖. ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๔๔.
मोह के समान जाल कोई नहीं।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๘.
काम भोगने वाला और भी अधिक काम चाहता है।
ม. ม. ๑๓/๔๑๑. ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๗.
काम भोगने वाला अतृप्त रहकर ही शरीर छोड़ता है।
ม. ม. ๑๓/๔๑๒. ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๗.
मन्दबुद्धि धन की लालसा में दूसरे को मारने की तरह अपने को ही मार डालता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๓.
लोग अविद्या से ढके हुए हैं।
วิ. จุล. ๗/๔๐๐. องฺ. จตุกฺก. ๒๑/๙๓.
โกธวรรค — หมวดโกรธ ๒๙ บท
क्रोध बिलकुल अच्छा नहीं।
ขุ. ชา. ฉกฺก. ๒๗/๑๘๘.
क्रोध संसार में शस्त्र की जंग के समान है।
สํ. ส. ๑๕/๖๐.
क्रोध विनाश उत्पन्न करता है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๙.
क्रोध चित्त को क्षुब्ध करता है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๙.
जब क्रोध मनुष्य पर छा जाता है, तब अन्धकार छा जाता है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๙. ขุ. มหา. ๒๙/๑๘.
क्रोध पहले थोड़ा फिर बहुत होता है; वह असहनशीलता से जन्म लेकर बढ़ता है।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๗๓.
क्रोध मन्दबुद्धियों का विषय है।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๘๐.
द्वेष का समुत्थान क्रोध है।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๗๓.
द्वेष के समान पकड़ने वाला कोई नहीं।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๘.
द्वेष के समान दोष कोई नहीं।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
क्रोध को मारकर मनुष्य सुख से रहता है।
สํ. ส. ๑๕/๕๗, ๖๔.
क्रोध को मारकर मनुष्य शोक नहीं करता।
สํ. ส. ๑๕/๕๗, ๖๔.
क्रोध से अभिभूत व्यक्ति कुशल को छोड़ देता है।
นัย- ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๘๖.
क्रोधी मनुष्य का वर्ण मलिन हो जाता है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๘.
क्रोधी मनुष्य दुःख से रहता है।
นัย. องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๘.
क्रोधी मनुष्य हित को ग्रहण करके भी अहित का आचरण करता है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๘.
क्रोध से अभिभूत व्यक्ति धन की हानि को प्राप्त होता है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๘.
क्रोध से उन्मत्त व्यक्ति यश और पद खो बैठता है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๘.
बन्धु, मित्र और सखा क्रोधी मनुष्य से दूर रहते हैं।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๙.
क्रोधी अर्थ को नहीं जानता।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๙.
क्रोधी धर्म को नहीं देखता।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๙.
क्रोधी जिसे नष्ट करना चाहे, उसके लिए कठिन भी सरल के समान हो जाता है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๙.
बाद में क्रोध शान्त होने पर वह आग में जलने के समान सन्तप्त होता है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๙.
क्रोध से अभिभूत व्यक्ति को तनिक भी सहारा नहीं रहता।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๙.
क्रोधी अपनी माता तक को मार सकता है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๙๙.
जिसमें क्रोध उत्पन्न हो गया, वह नष्ट हो गया।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๑๐๐.
क्रोध को दम से काट डाले।
นัย- องฺ. สตฺตก. ๒๓/๑๐๐.
क्रोध को प्रज्ञा से काट डाले।
นัย- องฺ. สตฺตก. ๒๓/๑๐๐.
क्रोध के वश में मत पड़ो।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๖๙.
ขันติวรรค — หมวดอดทน ๘ บท
खन्ती अर्थात् क्षमा परम तप है।
ที. มหา. ๑๐/๕๗. ขุ. ธ. ๒๕/๔๐.
क्षमा उतावलेपन को रोक देती है।
ว. ว.
क्षमा हित और सुख लाती है।
ส. ม.
क्षमा ज्ञानियों का आभूषण है।
ส. ม.
क्षमा उद्यमियों का तप है।
ส. ม.
क्षमा तपस्वियों का बल है।
ส. ม.
श्रमण-ब्राह्मण क्षमा-बल वाले होते हैं।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๒๒๗.
क्षमावान (दूसरों को) प्रिय होता है।
ส. ม.
จิตตวรรค — หมวดจิต ๑๓ บท
चित्त के मलिन होने पर दुर्गति की आशंका होती है।
ม. มู. ๑๒/๖๔.
चित्त के अमलिन रहने पर सुगति की आशा होती है।
ม. มู. ๑๒/๖๔.
संसार चित्त द्वारा ले जाया जाता है।
สํ. ส. ๑๕/๕๔.
चित्त का दमन अच्छा है।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๙.
दान्त चित्त सुख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๙.
रक्षित चित्त सुख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๙.
चित्त के वश में चलने वाला कष्ट पाता है।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๙๐.
चतुर लोगों ने अपने चित्त को सरल बना लिया है।
ที. มหา. ๑๐/๒๘๘.
अपने चित्त की गति में कुशल होना चाहिए।
นัย- องฺ. ทสก. ๒๔/๑๐๐.
अपने चित्त की रक्षा वैसे करे, जैसे कोई तेल से भरा पात्र सँभालकर ले जाता है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๑.
अपने चित्त की निरन्तर रक्षा करो।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๘.
प्रज्ञावान चित्त की रक्षा करे।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๙.
जिस-जिस विषय से पाप उत्पन्न हो, उस-उस विषय से मन को रोके।
สํ. ส. ๑๕/๒๐.
ชยวรรค — หมวดชนะ ๑๑ บท
विजयी वैर उत्पन्न करता है।
สํ. ส. ๑๕/๑๒๒. ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
धर्मदान सब दानों को जीत लेता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๓.
धर्मरस सब रसों को जीत लेता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๓.
धर्मरति सब रतियों को जीत लेती है।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๓.
तृष्णा-क्षय सब दुःखों को जीत लेता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๓.
जो विजय जीतकर फिर हार में बदल सकती है, वह विजय अच्छी नहीं।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๒.
जो विजय जीतकर फिर हार में नहीं बदलती, वह विजय अच्छी है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๒.
क्रोधी को अक्रोध से जीते।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๕. ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๕๐.
असाधु को साधुता से जीते।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๕. ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๕๐.
कृपण को दान से जीते।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๕. ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๕๐.
झूठ बोलने वाले को सत्य से जीते।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๕. ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๕๐.
ทานวรรค — หมวดทาน ๑๓ บท
कहा जाता है कि दान और युद्ध समान हैं।
สํ. ส. ๑๕/๒๙. ขุ. ชา. อฏฺฐก. ๒๗/๒๔๙.
जब चित्त श्रद्धा से भर जाता है, तो कोई भी दान छोटा नहीं कहलाता।
ขุ. วิมาน. ๒๖/๘๒.
विवेकपूर्वक दान देना सुगत द्वारा प्रशंसित है।
สํ. ส. ๑๕/๓๐. ขุ. ชา. อฏฺฐก. ๒๗/๒๔๙. เปต. ๒๖/๑๙๗.
केवल मूर्ख ही दान की प्रशंसा नहीं करते।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๘.
दाता मित्रता को बाँध लेता है।
สํ. ส. ๑๕/๓๑๖.
दाता प्रिय होता है; बहुत से लोग उसकी संगति करते हैं।
องฺ. ปญฺก. ๒๒/๔๓.
दाता प्रिय होता है।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๔๔.
सुख देने वाला ज्ञानी स्वयं सुख पाता है।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๔๕.
जो मनभावन वस्तु देता है, वह मनभावन वस्तु पाता है।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๕๕.
जो श्रेष्ठ वस्तु देता है, वह श्रेष्ठ पद को प्राप्त होता है।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๕๖.
जो सर्वोत्तम देता है, वह पुनः सर्वोत्तम पाता है।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๕๖.
देने से पुण्य बढ़ता है।
ที. มหา. ๑๐/๑๕๙. ขุ. อุ. ๒๕/๒๑๕.
मनुष्य को वही देना चाहिए जो देने योग्य हो।
ขุ. ชา. สตฺตก. ๒๗/๒๑๗.
ทุกขวรรค — หมวดทุกข์ ๘ บท
स्कन्धों के समान दुःख कोई नहीं।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
संस्कार परम दुःख हैं।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
बुरी तरह चलाया गया घर दुःख देता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๕.
दरिद्रता संसार में दुःख है।
องฺ. ฉกฺก. ๒๒/๓๙๔.
ऋण लेना संसार में दुःख है।
นัย- องฺ. ฉกฺก. ๒๒/๓๙๔.
निराश्रय व्यक्ति दुःख से रहता है।
นัย- องฺ. ทสก. ๒๔/๒๗, ๓๑.
पराजित व्यक्ति दुःख से रहता है।
สํ. ส. ๑๕/๑๒๒. ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
दुःख निश्चिन्त व्यक्ति पर नहीं पड़ता।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๔.
ธัมมวรรค — หมวดธรรม ๒๐ บท
धर्म बिना कीचड़ के सरोवर के समान है।
ขุ. ชา. ฉกฺก. ๒๗/๒๐๒.
सब धर्म मन के आगे चलने वाले हैं।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๕.
धर्म ही ऋषियों की ध्वजा है।
สํ. นิ. ๑๖/๒๖. องฺ. จตุกฺก. ๒๑/๖๖. ขุ. ชา. อสีติ. ๒๘/๑๕๒.
सत्पुरुषों का धर्म जानना कठिन है।
สํ. ส. ๑๕/๒๖. ขุ. ชา. ทุก. ๒๗๑๖๓. ขุ. ชา. ทสก. ๒๗๑๒๙๔.
सत्पुरुषों का धर्म जीर्ण नहीं होता।
สํ. ส. ๑๕/๑๐๒. ขุ. ธ. ๒๕/๓๕. ขุ. ชา. อสีติ. ๒๘/๑๓๖.
सत्पुरुषों का धर्म सत्पुरुषों द्वारा रक्षित है।
ที. มหา. ๑๐/๒๗๙.
भली-भाँति आचरित धर्म सुख लाता है।
สํ. ส. ๑๕/๕๘. ขุ. สุ. ๒๕/๓๖๐. ขุ. ชา. ทสก. ๒จ/๒๙๐. ขุ. เถร. ๒๖/๓๑๔.
सद्धर्म में स्थित व्यक्ति सबका हितकारी होता है।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๒๔๙.
धर्म में प्रीति रखने वाला सुख से रहता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๒๕.
धर्म का आचरण करने वाला सुख से रहता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๗, ๓๘. ขุ. อุ. ๒๕/๓๖๖.
धर्म ही धर्माचारी की रक्षा करता है।
ขุ. ชา. ทสกฺ ๒๗/๒๙๐. ขุ. เถร. ๒๖/๓๑๔.
धर्माचारी दुर्गति में नहीं जाता।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๙๐. ขุ. เถร. ๒๖/๓๑๔.
कीर्ति धर्म में स्थित व्यक्ति को नहीं छोड़ती।
องฺ. ปญฺจก. ๒๓/๕๑.
धर्म में स्थित व्यक्ति पाप नहीं करता।
องฺ. จตุตกฺก. ๒๑/๒๕.
किसी भी धर्म को पकड़ना (आसक्ति करना) नहीं चाहिए।
ม. ม. ๑๒/๔๖๔.
धर्म का योनिसो (बुद्धिपूर्वक) विचय करे।
ม. อุปฺ ๑๔/๔๗๑. สํ. ส. ๑๕/๗๘. องฺ. สตฺตก. ๒๓/๓.
धर्म का सुचरित आचरण करे, दुश्चरित नहीं।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๘. ขุ. อุ. ๒๕/๓๖๖.
सद्धर्म का आदर करना चाहिए।
องฺ. จตุกฺก. ๒๑/๒๗.
पण्डित काले (अकुशल) धर्म को त्याग दे।
สํ. มหา. ๑๙/๒๙. ขุ. ธ. ๒๕/๒๖.
पण्डित शुक्ल (कुशल) धर्म की भावना करे।
สํ. มหา. ๑๙/๒๙. ขุ. ธ. ๒๕/๒๖.
ปกิณณกวรรค — หมวดเบ็ดเตล็ด ๖๕ บท
मार्गों में अष्टांगिक मार्ग क्षेम-मार्ग है, जो अमृत तक पहुँचाता है।
ม. ม. ๑๓/๒๘๑.
सब क्लेशों से शुद्धि ही सब दुःखों का निरोध है।
ร. ร. ๔.
जो कुछ उत्पन्न होने वाला है, वह सब निरुद्ध होने वाला है।
สํ. มหา. ๑๙/๕๓๑.
जो प्रत्ययों से बना है, वह प्रत्ययों के अनुसार चलता है।
ร. ร. ๔.
आरोग्य परम लाभ है।
ม. ม. ๑๓/๒๘๑. ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
भूख सबसे बड़ा रोग है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
कोई स्थायी संस्कार नहीं है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๙.
सब संस्कार सचमुच अनित्य हैं।
ที. มหา. ๑๐/๑๘๑. สํ. ส. ๑๕/๘. สํ. นิ. ๑๖/๒๒๘.
क्षण-सम्पत्ति दुर्लभ है।
ส. ม.
बार-बार बुद्ध का दर्शन दुर्लभ है।
ม. ม. ๑๓/๕๕๔. ขุ. สุ. ๒๕/๔๔๔.
क्षण तुम्हें लाँघकर न निकल जाए।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๒๓๑. ขุ. ธ. ๒๕/๕๗. ขุ. สุ. ๒๕/๓๘๙.
वय क्षण के समान बीत जाता है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๑๒.
काल सब प्राणियों को अपने सहित खा जाता है।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๙๕.
काम छोड़ देने वाले युवक के पास से लाभ निकल जाता है।
ที. ปาฏิ. ๑๑/๑๙๙.
नक्षत्र (मुहूर्त) देखते रहने वाले मूर्ख के पास से लाभ निकल गया।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๑๖.
प्रयोजन ही प्रयोजन का नक्षत्र (मुहूर्त) है, तारे क्या करेंगे?
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๑๖.
संसार में सत्ता ही बड़ी है।
สํ. ส. ๑๕/๖๐.
श्री भोगों का आश्रय है।
สํ. ส. ๑๕/๖๑.
शिल्पहीन व्यक्ति का जीवन कठिन होता है।
ขุ. ชา. ทฺวาทส. ๒๗/๓๓๐.
कोई भी शिल्प क्यों न हो, वह लाभ सिद्ध करता है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๕.
मात्रा जानना सदा लाभ सिद्ध करता है।
ว. ว.
लज्जा और भय (हिरि-ओत्तप्प) संसार की भली-भाँति रक्षा करते हैं।
ว. ว.
मैत्री संसार का आधार है।
ว. ว.
ईर्ष्या संसार के विनाश का कारण है।
ว. ว.
करुणा से (दूसरों का दुःख) सह न सकने वाला स्वभाव महापुरुष का लक्षण है।
ว. ว.
कृतज्ञता और कृतवेदिता सज्जन का लक्षण है।
นัย- ส. ส.
सारी पृथ्वी देकर भी कृतघ्न को प्रसन्न नहीं किया जा सकता।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๓.
भोग-सम्पत्ति मन्दबुद्धि को मार डालती है।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๓.
सत्कार दुष्ट को मार डालता है।
วิ. จุล. ๗/๑๗๒. สํ. ส. ๑๕/๒๒๖. สํ. นิ. ๑๖/๒๘๔.
मनुष्य-जन्म पाना कठिन है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๙.
प्राणियों का जीवन कठिन है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๙.
सत्पुरुषों के धर्म का श्रवण कठिन है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๙.
बुद्धों का उत्पन्न होना कठिन है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๙.
न दोहराना मन्त्रों का मल है।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๑๙๘. ขุ. ธ. ๒๕/๔๗.
अनुद्यम घर का मल है।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๑๙๘. ขุ. ธ. ๒๕/๔๗.
आलस्य सौन्दर्य (वर्ण) का मल है।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๑๙๘. ขุ. ธ. ๒๕/๔๗.
दुराचार स्त्री का मल है।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๑๙๘. ขุ. ธ. ๒๕/๔๗.
शुद्धि और अशुद्धि अपनी-अपनी होती है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๗. ขุ. มหา. ๒๙/๓๗. ขุ. จู. ๓๐/๑๑๖.
कोई दूसरे को शुद्ध नहीं कर सकता।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๗. ขุ. มหา. ๒๙/๓๗. ขุ. จู. ๓๐/๑๑๖.
शुद्ध कर्म वाले शुचि व्यक्ति का व्रत सदा सम्पन्न होता है।
ม. ม. ๑๒/๗๐.
दूसरों के दोष देखना आसान है, अपने दोष देखना कठिन।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๘.
पापकर्म करने वाले के लिए संसार में कोई गुप्त स्थान नहीं है।
องฺ. ติก. ๒๐/๑๘๙. ขุ. ชา. จตุตกฺก. ๒๗/๑๓๑.
जिस सभा में सत्पुरुष न हों, वह सभा नहीं कहलाती।
สํ. ส. ๑๕/๒๗๐. ขุ. ชา. อสีติ. ๒๘/๑๕๑.
संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे पकड़कर निर्दोष रहा जा सके।
ร. ร. ๔.
सुगृहस्थ का धन बनती हुई बाँबी की तरह बढ़ता जाता है।
ที. ปาฏิ. ๑๑/๒๐๒.
रूप मूर्ख को मोह सकता है, पर निर्वाण-गवेषी को नहीं।
ม. ม. ๑๓/๔๐๑. ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๗.
प्राणी का शरीर नष्ट हो सकता है, पर नाम और गोत्र नष्ट नहीं होते।
สํ. ส. ๑๕/๕๙.
स्त्रियों का स्वभाव जानना कठिन है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๑.
संकट के समय शूरवीर की आवश्यकता होती है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๐.
मन्त्रियों में वाचाल न हो, ऐसा व्यक्ति चाहिए।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๐.
खान-पान के समय प्रिय व्यक्ति की आवश्यकता होती है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๐.
जब कोई मामला उठे, तब पण्डित की आवश्यकता होती है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๐.
साहस संकट के समय जाना जाता है।
นัย-ขุ. อุ. ๒๕/๑๗๘.
यश पाकर उन्मत्त नहीं होना चाहिए।
ขุ. ชา. จตุกฺก. ๒๗/๑๔๕.
त्याग को बढ़ाना चाहिए।
ม. อุป. ๑๔/๔๓๖.
शान्ति का ही अभ्यास करे।
นัย-ม. อุป. ๑๔/๔๓๖.
शान्ति चाहने वाला संसार के आमिष (लोभ-वस्तु) को छोड़ दे।
สํ. ส. ๑๕/๓, ๗๗, ๙๐.
जो अनुचित नहीं है, उसे ग्रहण करे।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๑.
सामने जैसा आचरण करे, पीछे भी वैसा ही करे।
ส. ส.
पहुँचने से पहले डींग नहीं मारनी चाहिए।
ส. ส.
सहारे के साथ रहो, बिना सहारे मत रहो।
นัย. องฺ. ทสกฺ ๒๔/๒๕.
दूसरों के सहारे जीना नहीं चाहिए।
ขุ. อุ. ๒๕/๑๗๙.
परम लाभ आरोग्य की कामना करे।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๗.
बीती बातों का चिन्तन नहीं करना चाहिए।
ม. อุป. ๑๔/๓๔๘.
अनागत की आशा नहीं करनी चाहिए।
ม. อุป. ๑๔/๓๔๘.
ปัญญาวรรค — หมวดปัญญา ๒๑ บท
प्रज्ञा के समान प्रकाश कोई नहीं।
สํ. ส. ๑๕/๙.
प्रज्ञा संसार में प्रकाश है।
สํ. ส. ๑๕/๖๑.
प्रज्ञा योग (अभ्यास) से उत्पन्न होती है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๒.
प्रज्ञा का क्षय अयोग (अभ्यास के अभाव) से होता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๒.
प्रज्ञा की प्राप्ति सुख उत्पन्न करती है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๙.
प्रज्ञा मनुष्यों का रत्न है।
สํ. ส. ๑๕/๕๐.
प्रज्ञा ही धन से श्रेष्ठ है।
นัย- ม. ม. ๑๓/๔๑๓. นัย- ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๙.
प्रज्ञाहीन के लिए ध्यान (चिन्तन) नहीं होता।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๕.
जो ध्यान (चिन्तन) नहीं करता, उसे प्रज्ञा नहीं होती।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๕.
प्रज्ञा उस पुरुष का शासन करती है।
สํ. ส. ๒๕/๕๒.
आलसी प्रज्ञा से मार्ग नहीं पाता।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๒.
अप्रमत्त, विचारशील और ध्यान से सुनने वाला प्रज्ञा पाता है।
สํ. ส. ๑๕/๓๑๖. ขุ. สุ. ๒๕/๓๖๑.
मनुष्य प्रज्ञा से अर्थ को देखता है।
องฺ. สตฺตก. ๒๓/๓.
मनुष्य प्रज्ञा से शुद्ध होता है।
ขุ. สุ. ๒๕/๓๖๑.
चतुर लोग कहते हैं कि प्रज्ञा ही सर्वश्रेष्ठ है।
ขุ. ชา. สตฺตก. ๒๗/๕๔๑.
ज्ञानी प्रज्ञा से जीने वाले के जीवन को श्रेष्ठ कहते हैं।
สํ. ส. ๑๕/๕๘, ๓๑๕. ขุ. สุ. ๒๕/๓๖๐.
भाषित के अर्थ को जानने वाला एक ही प्रज्ञावान श्रेष्ठ है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๒.
प्रज्ञावान गृहस्थ बहुतों के हित के लिए होता है।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๒๔๙.
प्रज्ञा संवाद से जानी जाती है।
นัย. ขุ. อุ. ๒๕/๑๗๘.
जिस प्रकार से प्रज्ञा बढ़े, उसी प्रकार अपने को स्थापित करे।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๒.
प्रज्ञा की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
ม. อุป. ๑๔/๔๓๖.
ปมาทวรรค — หมวดประมาท ๘ บท
प्रमाद मृत्यु का मार्ग है।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๘. ขุ. ชา. ตึส. ๒๗/๕๒๔.
प्रमाद रक्षक का मल है।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๑๙๘. ขุ. ธ. ๒๕/๔๗.
प्रमाद की पण्डित सदा निन्दा करते हैं।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๙.
मन्दबुद्धि मूर्ख प्रमाद में ही लगे रहते हैं।
ม. ม. ๑๓/๔๘๘. สํ. ส. ๑๕/๓๖. ขุ. ธ. ๒๕/๑๘.
प्रमत्त व्यक्ति दीर्घकाल तक शोक करता है।
นัย-ม. อุป. ๑๔/๓๔๖.
प्रमत्त व्यक्ति मरे हुए के समान है।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๘. ขุ. ชา. ตึส. ๒๗/๕๒๔.
प्रमाद में मत लगे रहो।
ม. ม. ๑๓/๔๘๘. สํ. ส. ๑๕/๓๖. ขุ. ธ. ๒๕/๑๘.
प्रमाद के साथ संगति नहीं करनी चाहिए।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๗. ขุ. สุ. ๒๕/๕๑๘. ขุ. มหา. ๒๙/๕๑๕.
ปาปวรรค — หมวดบาป ๑๓ บท
पाप-धर्म सचमुच मल हैं, इस लोक में भी और परलोक में भी।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๑๙๘. ขุ. ธ. ๒๕/๔๗.
पाप का संचय दुःख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๐.
पाप न करना सुख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๙.
दुष्ट के लिए पाप करना सरल है।
วิ. จุล. ๗/๑๙๕. ขุ. อุ. ๒๕/๑๖๘.
शुद्ध व्यक्ति पाप में आनन्द नहीं लेता।
วิ. มหา. ๕/๓๔. ขุ. อุ. ๒๕/๑๖๖.
पाप-स्वभाव वाला व्यक्ति अपने ही कर्मों से दुःख पाता है।
ม. ม. ๑๓๔๑๓. ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๙.
सज्जन तप के द्वारा पापकर्म का त्याग करते हैं।
ขุ. ชา. อฏฺฐก. ๒๗/๒๔๕.
लोग मोह के कारण पापकर्म करते हैं।
ม. ม. ๑๓/๔๑๓. ขุ. ชา. ปกิณฺณก. ๒๗/๓๘๐.
जो पाप नहीं करता, उसके लिए पाप नहीं है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๑.
जब मैं धर्म कह रहा होता हूँ, पाप मुझे नहीं लगता।
ขุ. ชา. สตฺตก ๒๗/๒๒๔.
कोई ऐसा पाप नहीं जिसे झूठ बोलने वाला न करे।
นัย. ขุ. ธ. ๒๕/๓๘. นัย. ขุ. อิติ. ๒๕/๒๔๓.
सब पापों से बचना चाहिए।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๑.
भोजन के लिए भी पाप नहीं करना चाहिए।
นัย- ขุ. ชา. นวก. ๒๗/๒๖๒.
ปุคคลวรรค — หมวดบุคคล ๗๐ บท
पण्डित कहलाने वाला सचमुच प्रयोजन सिद्ध करता है।
อ. ส. ๑๕/๓๐๙. ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๒.
शीलसम्पन्न पण्डित प्रज्वलित अग्नि के समान चमकता है।
ที. ปาฏิ. ๑๑/๒๐๒.
पण्डित अनर्थ को छोड़कर केवल अर्थ (हित) को ग्रहण करता है।
องฺ. จตุกฺก. ๒๑/๕๙.
पण्डित इन्द्रियों की रक्षा करता है।
ที. มหา. ๑๐/๒๘๘. สํ. ส. ๑๕/๓๗.
पण्डित उतार-चढ़ाव (उल्लास-विषाद) नहीं दिखाता।
ขุ. ธ. ๒๕/๒๖.
पण्डित का बल दूसरों के दोष न देखना है।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๒๒๗.
आजानीय (श्रेष्ठ) पुरुष दुर्लभ है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๑.
अंग-गुणों से सम्पन्न व्यक्ति दुर्लभ है।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๘๕.
मनुष्यों में जिसने अपने को वश में किया है, वही श्रेष्ठ है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๗. ขุ. มหา. ๒๙/๒๙๑. ขุ. จู. ๓๐/๗๔.
नाथ (शरणदाता) महाकारुणिक हैं।
ส. ม.
चतुर व्यक्ति पाप को त्याग देता है।
ที. มหา. ๑๐/๑๕๙. ขุ. อุ. ๒๕/๒๑๕.
प्रज्ञावान बताने योग्य मार्ग बताता है।
ขุ. ชา. เตรส. ๒๗/๓๕๕.
प्रज्ञावान अपने काम से बाहर की बात में नहीं लगता।
ขุ. ชา. เตรส. ๒๗/๓๕๕.
ज्ञानी धन पाकर ज्ञातियों का संग्रह (सहायता) करता है।
ขุ. ชา. ฉกฺก. ๒๗/๒๐๕.
समूह का संचालन करने की शक्ति वाला ज्ञानी प्रयोजन सिद्ध करता है।
ขุ. ชา. สตฺตก. ๒๗/๒๒๑.
सत्पुरुष काम की इच्छा से बात नहीं करते।
ขุ. ธ. ๒๕/๒๖.
जो धर्म के अनुसार नहीं बोलता, वह सत्पुरुष नहीं।
สํ. ส. ๑๕/๒๗๐.
सत्पुरुष प्राणियों के उपकार में आनन्दित होते हैं।
ชาตกฏฺฐกถา ๑/๒๓๐.
सत्पुरुष हिमालय पर्वत की तरह दूर से ही प्रकट होते हैं।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๕.
सत्पुरुष स्वर्ग को जाने वाले होते हैं।
สํ. ส. ๑๕/๒๗. ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๖๔.
सत्पुरुष सब दिशाओं में फैल जाते हैं।
องฺ. ติก. ๒๐/๒๙๑. ขุ. ธ. ๒๕/๒๒.
शान्त व्यक्ति सुख से रहता है।
วิ. จุล. ๗/๑๐๖. สํ. ส. ๑๕/๓๑๒. องฺ. ติก. ๒๐/๑๗๕.
सत्पुरुषों की सुगन्ध हवा के विपरीत भी फैलती है।
องฺ. ติก. ๒๐/๒๙๑. ขุ. ธ. ๒๕/๒๒.
सज्जन अनासक्ति से मुक्त होते हैं।
ม. อุป. ๑๔/๓๔๖. องฺ. ติก. ๒๐/๑๘๐.
जो मूर्ख अपनी मूर्खता को जानता है, वह उतने से पण्डित है।
ขุ. ธ. ๒๕/๒๓.
समूह का संचालन करने की शक्ति वाला मूर्ख प्रयोजन सिद्ध नहीं करता।
ขุ. ชา. สตฺตก. ๒๗/๒๒๑.
मूर्ख को नेता नहीं होना चाहिए।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๘๙.
मूर्ख का बल दूसरों के दोष देखना है।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๒๒๗.
असत्पुरुष यहीं बैठे हुए भी दिखाई नहीं देते, जैसे रात में छोड़े गए बाण।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๕.
असत्पुरुष नरक में जाते हैं।
สํ. ส. ๑๕/๒๗. ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๖๔.
मन्दबुद्धि न बताने योग्य मार्ग बताता है।
ขุ. ชา. เตรส. ๒๗/๓๕๕.
मन्दबुद्धि अपने काम से बाहर की बात में लगता है।
ขุ. ชา. เตรส. ๒๗/๓๕๕.
मन्दबुद्धि लाभ को गँवा देता है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๑๕.
मन्दबुद्धि द्रोह करता है।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๙๑.
चोर संसार के लिए अशुभ (कलंक) हैं।
สํ. ส. ๑๕/๖๐.
अच्छे को जानने वाला उन्नति करता है।
ขุ. สุ. ๒๕/๓๔๖.
बुरे को जानने वाला अवनति करता है।
ขุ. สุ. ๒๕/๓๔๖.
धर्म को प्रिय मानने वाला उन्नति करता है।
ขุ. สุ. ๒๕/๓๔๖.
धर्म से द्वेष करने वाला अवनति करता है।
ขุ. สุ. ๒๕/๓๔๖.
सत्कार करने वाला सत्कार पाता है।
ขุ. ชา. มหา. ๒๘/๑๕๔.
आदर करने वाले का आदर होता है।
ขุ. ชา. มหา. ๒๘/๑๕๔.
पूजा करने वाला पूजा पाता है।
ขุ. ชา. มหา. ๒๘/๑๕๔.
वन्दना करने वाले को प्रतिवन्दना मिलती है।
ขุ. ชา. มหา. ๒๘/๑๕๔.
बहुश्रुत को विचार को ही प्रधान मानना चाहिए।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๒๒๗.
बहुत से ज्ञाति होना लाभ सिद्ध करता है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๓.
घनिष्ठता परम ज्ञाति (नाता) है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
अकेले खाने वाले को सुख नहीं मिलता।
ขุ. ชา. ทฺวาทส. ๒๗/๓๓๓.
संसार में ऐसा कोई नहीं जिसकी निन्दा न हो।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๕.
दुर्बल का तिरस्कार किया जाता है।
ขุ. ชา. ทฺวาทส. ๒๗/๓๓๙.
कठोर के वैरी होते हैं।
ขุ. ชา. ทฺวาทส. ๒๒/๓๓๙.
प्रेम में पड़ा व्यक्ति बहुत बोलता है।
ขุ. ชา. ทฺวาทส. ๒๗/๓๓๙.
क्रोधित व्यक्ति बहुत बोलता है।
ขุ. ชา. ทฺวาทส. ๒๗/๓๓๙.
उपाय के बिना लाभ चाहने वाला कष्ट पाता है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๑๖.
सरल (ईमानदार) व्यक्ति सत्य से हटकर नहीं बोलता।
ขุ. ชา. จตุกฺก. ๒๗/๑๒๘.
जैसा कहे, वैसा करे।
ที. มหา. ๑๐/๒๕๕. ขุ. สุ. ๒๕/๓๙๔. ขุ. เถร. ๒๖/๔๔๑. ขุ. ชา. จตุตฺก. ๒๗/๑๔๖.
संसार में कुछ लोग लज्जा से रुके रहते हैं।
สํ. ส. ๑๕/๑๑. ขุ. ธ. ๒๕/๓๔.
कवि गाथाओं के आश्रय हैं।
สํ. ส. ๑๕/๕๒.
माता-पिता (सन्तान के लिए) ब्रह्मा कहे गए हैं।
องฺ. ติก. ๒๐/๑๖๘. องฺ. จตุกฺก. ๒๑/๙๒. ขุ. อิติ. ๒๕/๓๑๔.
माता-पिता (सन्तान के लिए) पूर्वाचार्य कहे गए हैं।
องฺ. ติก. ๒๐/๑๖๘. องฺ. จตุกฺก. ๒๑/๙๒. ขุ. อิติ. ๒๕/๓๑๔.
माता-पिता सन्तान के आदरणीय हैं।
องฺ. ติก. ๒๐/๑๖๘. องฺ. จตุกฺก. ๒๑/๙๒. ขุ. อิติ. ๒๕/๓๑๔.
स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य का मल हैं।
สํ. ส. ๑๕/๕๒, ๕๙.
स्त्रियाँ सब वस्तुओं में श्रेष्ठ हैं।
สํ. ส. ๑๕/๖๐.
चतुर पत्नी पति और सब आदरणीय जनों का आदर करती है।
องฺ. อฏฺฐก. ๒๓/๒๗๓.
पति स्त्री का लक्षण (प्रतिष्ठा) है।
สํ. ส. ๑๕/๕๗.
पत्नियों में आज्ञाकारिणी पत्नी श्रेष्ठ है।
สํ. ส. ๑๕/๑๐.
पुत्रों में आज्ञाकारी पुत्र श्रेष्ठ है।
สํ. ส. ๑๕/๑๐.
सन्तान मनुष्यों का आधार है।
สํ. ส. ๑๕/๕๑.
केवल उन्नति का काम करे; दूसरों को पीड़ा न दे।
ขุ. ชา. สตฺตก. ๒๗/๒๑๒.
जिसमें अच्छाई है, वह अपनी अच्छाई की रक्षा करे।
ส. ส.
अभी न आए हुए भय से बचाव करना चाहिए।
ขุ. ชา. จตุกฺก. ๒๗/๑๓๖.
ปุญญวรรค — หมวดบุญ ๕ บท
पुण्य को चोर नहीं ले जा सकते।
สํ. ส. ๑๕/๕๐.
पुण्य जीवन के अन्त में सुख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๙.
पुण्य का संचय सुख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๓๐.
पुण्य परलोक में प्राणियों का आश्रय है।
สํ. ส. ๑๕/๒๖. องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๔๔. ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๙๔.
सुख देने वाले पुण्यकर्म करने चाहिए।
สํ. ส. ๑๕/๓. องฺ. ติก. ๒๐/๑๙๘.
มัจจุวรรค — หมวดมฤตยู ๑๐ บท
प्राणियों का जीवन मिट्टी के बर्तन जैसा है, जिसका अन्त टूटना ही है।
ที. มหา. ๑๐/๑๔๑. ขุ. สุ. ๒๕/๔๔๘. ขุ. มหา. ๒๙/๑๔๕.
ज्ञानी कहते हैं कि यह जीवन बहुत थोड़ा है।
ม. ม. ๑๓/๔๑๒. ขุ. สุ. ๒๕/๔๘๕. ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๘.
महासेना वाले मृत्यु से मोहलत नहीं मिलती।
ม. อุ. ๑๔/๓๔๘. ขุ. ชา. มหา. ๒๘/๑๖๕.
जब प्राणी को जरा ले चलती है, तब कोई रक्षक नहीं होता।
สํ. ส. ๑๕/๓. องฺ. ติก. ๒๐/๑๙๘. ขุ. ชา. วีส. ๒๗/๔๑๖.
जब प्राणी मरने को होता है, तब कोई रक्षक नहीं होता।
ม. ม. ๑๓/๔๑๒. ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๘.
थोड़ा-सा धन भी मरे हुए के पीछे नहीं जाता।
ม. ม. ๑๓/๔๑๒. ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๘.
धन से बुढ़ापे को दूर नहीं किया जा सकता।
ม. ม. ๑๓/๔๑๒. ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๘.
धन से मनुष्य दीर्घायु नहीं होता।
ม. ม. ๑๓/๔๑๒. ขุ. เถร. ๒๖/๓๗๘.
सब प्राणी अपना शरीर संसार में छोड़ जाएँगे।
ที. มหา. ๑๐/๑๘๑. สํ. ส. ๑๕/๒๓๒.
धनी और निर्धन, दोनों के आगे मृत्यु है।
ที. มหา. ๑๐/๑๔๑. ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๑๗.
มิตตวรรค — หมวดมิตร ๑๒ บท
(गाड़ियों या लदे पशुओं का) काफ़िला यात्री का मित्र है।
สํ. ส. ๑๕/๕๐.
माता अपने घर में मित्र है।
สํ. ส. ๑๕/๕๐.
सहायक बार-बार आवश्यकता पड़ने वाले का मित्र है।
สํ. ส. ๑๕/๕๑.
मित्र-द्रोह न करने वाले की सर्वत्र पूजा होती है।
ขุ. ชา. นวก. ๒๗/๕๔.
मित्र-द्रोह न करने वाला सब शत्रुओं को पार कर जाता है।
ขุ. ชา. นวก. ๒๗/๑๕๕.
मित्र-द्रोही सचमुच नीच है।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๙๗.
बुरे मित्र और बुरे साथी वाले का आचार और आवागमन भी बुरा होता है।
ที. ปาฏิ. ๑//๑๙๘.
पत्नी परम सखा है।
สํ. ส. ๑๕/๕๑.
मूर्खों के साथ सहायता (मैत्री) नहीं होती।
วิ. มหา. ๕/๓๓๖. ม. อุ. ๑๔/๒๙๗. ขุ. ธ. ๒๕/๒๓, ๕๙.
आवश्यकता पड़ने पर सहायक सुख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๙.
यदि विचारशील साथी मिले, तो प्रसन्न होकर स्मृतिमान होते हुए उसके साथ विचरे।
วิ. มหา. ๕/๓๓๖. ม. อุป. ๑๔/๒๙๗.
यदि विचारशील साथी न मिले, तो अकेले विचरे और पाप न करे।
วิ. มหา. ๕/๓๓๖. ม. อุป. ๑๔/๒๙๗.
ยาจนาวรรค — หมวดขอ ๕ บท
प्रज्ञावान याचना नहीं करता।
ขุ. ชา. สตฺตก. ๒๗/๒๒๐.
याचक (जिससे माँगा जाए उसे) प्रिय नहीं होता।
วิ. มหาวิภงฺค. ๑/๓๓๗๗. ขุ. ชา. สตฺตก. ๒๗/๒๒๐.
माँगे जाने पर जो माँगी हुई चीज़ नहीं देता, वह (याचक को) प्रिय नहीं होता।
วิ. มหาวิภงฺค. ๑/๓๓๗. ขุ. ชา. สตฺตก. ๒๙/๒๒๐.
बहुत माँगने से मनुष्य अप्रिय हो जाता है।
วิ. มหาวิภงฺค. ๑/๓๓๔. ขุ. ชา. ติก. ๒๗/๑๐๐.
जो वस्तु दूसरे को प्रिय है, यह जानकर उसे नहीं माँगना चाहिए।
วิ. มหาวิภงฺค. ๑/๓๓๔. ขุ. ชา. ติก. ๒๗/๑๐๐.
ราชวรรค — หมวดพระราชา ๗ บท
राजा राष्ट्र का लक्षण (प्रतिष्ठा) है।
สํ. ส. ๑๕/๕๗.
राजा प्रजा का मुखिया है।
วิ. มหา. ๕/๑๒๔. ม. ม. ๑๓/๕๕๖. ขุ. ส. ๒๕/๔๔๖.
यदि राजा धार्मिक हो, तो सारी प्रजा सुखी होती है।
องฺ. จตุตก. ๒๑/๙๙. ขุ. ชา. จตุกฺก. ๒๗/๑๕๒.
जो राजा क्रोधी पर पलटकर क्रोध नहीं करता, प्रजा उसकी पूजा करती है।
ขุ. ชา. จตุกฺก. ๒๗/๑๘๗.
युद्ध-वेश में राजा शोभायमान होता है।
สํ. นิ. ๑๖/๓๓๑. ขุ. ธ. ๒๕/๖๗.
गोत्र को मानने वाले लोगों में क्षत्रिय (राजा) श्रेष्ठ है।
ที. ปาฏิ. ๑๑/๑๐๗. ม. ม. ๑๓/๓๒. สํ. ส. ๑๕/๒๒๕. สํ. นิ. ๑๖/๓๓๑.
राजा प्रजा की सदा वैसे ही रक्षा करे, जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है।
นัย-ส. ส.
วาจาวรรค — หมวดวาจา ๑๓ บท
वाणी मन के समान होती है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๑๓๘.
सुन्दर वाणी बोलना लाभ सिद्ध करता है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๘.
बुरी वाणी बोलने वाला संताप पाता है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๘.
क्रोधी की वाणी कठोर होती है।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๗๓.
झूठ बोलने वाला नरक में जाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๕.
शुद्धि वाणी से जानी जाती है।
นัย-ขุ. อุ. ๒๕/๑๗๘.
सुन्दर वाणी बोलनी चाहिए।
สํ. ส. ๑๕/๖๐.
मधुर और हितकारी वाणी बोलनी चाहिए।
ขุ. ชา. เตรส. ๒๗/๓๕๐.
केवल ऐसी वाणी बोले जो अपने को कष्ट न दे।
สํ. ส. ๑๕/๒๗๘. ขุ. สุ. ๒๕/๔๑๑.
केवल प्रिय वाणी बोलनी चाहिए。
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๑๐.
कभी भी अप्रिय वाणी नहीं बोलनी चाहिए।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๑๐.
अच्छी बात भी असमय नहीं कहनी चाहिए।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๘๐. ขุ. สุ. ๒๕/๕๒๓. ขุ. มหา. ๒๙/๖๒๒.
बुरी वाणी कभी नहीं बोलनी चाहिए।
ขุ. ชา. ๒๗/๒๘.
วิริยวรรค — หมวดเพียร ๑๒ บท
उद्यमी समय पर आए लाभ को नहीं गँवाता।
ขุ. ชา. ฉกฺก. ๒๗/๑๙๕.
मनुष्य वीर्य (उद्यम) से दुःख को पार करता है।
ขุ. สุ. ๒๕/๓๖๑.
जो कर्तव्य में लगा रहकर काम को यथोचित ढंग से करता है, वह धन पाता है।
สํ. ส. ๑๕/๓๑๖. ขุ. สุ. ๒๕/๓๖๑.
जो आलसी नहीं है, वह हृदय की शान्ति पा सकता है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๑.
ऊब कर काम करने वाले का प्रयोजन ठीक से सिद्ध नहीं होता।
ขุ. ชา. จตฺตาฬีส. ๒๗/๕๓๓.
बिना ऊबे काम करने वाले का प्रयोजन ठीक से सिद्ध होता है।
ขุ. ชา. จตฺตาฬีส. ๒๗/๕๓๓.
पिछड़े हुए काम में उद्यम करने वाला विपत्ति में डूब जाता है।
ขุ. ชา. วีส. ๒๗/๔๓๔.
‘कल’ कहकर टालने वाला अवनति करता है; ‘परसों’ कहने वाला और भी अधिक।
ขุ. ชา. วีส. ๒๗/๔๖๖.
आज ही उद्यम कर लेना चाहिए।
ม. อุป. ๑๔/๓๔๘. ขุ. ชา. มหา. ๒๘/๑๖๕.
पुरुष तब तक प्रयत्न करे, जब तक प्रयोजन सिद्ध न हो।
สํ. ส. ๑๕/๓๓๐.
अप्रमत्त व्यक्ति दृढ़ता से उद्यम करे।
นัย- ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๗๘.
जहाँ जिस प्रकार से लाभ मिले, वहाँ उसी प्रकार से प्रयत्न करे।
องฺ. ปญฺจก. ๒๒/๗๐. ขุ. ชา. ปญฺจก. ๒๗/๑๘๐.
เวรวรรค — หมวดเวร ๔ บท
वैर बाँधने वाले का वैर शान्त नहीं होता।
นัย- ม. อุป. ๑๔/๒๙๗. นัย- ขุ. ธ. ๒๕/๑๕. นัย- ขุ. ชา. ปญฺจก. ๒๗/๑๘๒.
वैर न बाँधने वाले का वैर शान्त हो जाता है।
นัย-ม. อุป. ๑๔/๒๙๗. นัย-ขุ. ธ. ๒๕/๑๕. นัย-ขุ. ชา. ปญฺจก. ๒๗/๑๘๒.
वैर अवैर से शान्त होता है।
วิ. มหา. ๕/๓๓๖. ม. อุป. ๑๔/๒๙๗. ขุ. ธ. ๒๕/๑๕. ขุ. ชา. ปญฺจก. ๒๗/๑๘๒.
इस संसार में वैर वैर से कभी शान्त नहीं होता।
วิ. มหา. ๕/๓๓๖. ม. อุป. ๑๔/๒๙๗. ขุ. ธ. ๒๕/๑๕. ขุ. ชา. ปญฺจก. ๒๗/๑๘๒.
สัจจวรรค — หมวดความสัตย์ ๕ บท
सत्य ही सब रसों से श्रेष्ठ है।
สํ. ส. ๑๕/๕๘. ขุ. ชา. ๒๕/๓๖๐.
सत्य वचन ही अमर वाणी है।
สํ. ส. ๑๕/๒๗๘. ขุ. เถร. ๒๖/๔๓๔.
मनुष्य सत्य से कीर्ति (यश) पाता है।
สํ. ส. ๑๕/๓๑๖. ขุ. สุ. ๒๕/๓๖๑.
सत्पुरुष अर्थयुक्त और धर्मयुक्त सत्य में स्थित हैं।
สํ. ส. ๑๕/๒๗๘. ขุ. สุ. ๒๕/๔๑๒. ขุ. เถร. ๒๖/๔๓๔.
सत्य की रक्षा करते रहना चाहिए।
ม. อุป. ๑๔/๔๓๖.
สติวรรค — หมวดสติ ๖ บท
स्मृति ही संसार में जागृति का धर्म है।
สํ. ส. ๑๕/๖๑.
स्मृति सर्वत्र वांछनीय है।
ว. ว.
स्मृतिमान व्यक्ति सदा उन्नति करता है।
สํ. ส. ๑๕/๓๐๖.
स्मृतिमान व्यक्ति सुख पाता है।
สํ. ส. ๑๕/๓๐๖.
स्मृतिमान व्यक्ति दिन-प्रतिदिन श्रेष्ठ होता जाता है।
สํ. ส. ๑๕/๓๐๖.
रक्षक स्मृतिपूर्वक रक्षा करे।
ส. ส.
สัทธาวรรค — หมวดศรัทธา ๕ บท
श्रद्धा पाथेय (अर्थात् कुशल) को संचित करती है।
สํ. ส. ๑๕/๖๑.
सुस्थिर श्रद्धा लाभ सिद्ध करती है।
สํ. ส. ๑๕/๕๐.
सुस्थिर श्रद्धा सुख लाती है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๙.
श्रद्धा इस संसार में मनुष्य का श्रेष्ठ धन है।
สํ. สํ. ๑๕/๕๘. ขุ. สุ. ๒๕/๓๖๐.
श्रद्धा मनुष्य की दूसरी (साथी) है।
สํ. ส. ๑๕/๓๕, ๕๒.
สันตุฏฐิวรรค — หมวดสันโดษ ๕ บท
सन्तोष परम धन है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
जो मिले उसी में सन्तोष सुख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๙.
जिसे धर्म प्रकट और दृष्ट है, उस सन्तुष्ट व्यक्ति का एकान्त सुख लाता है।
วิ. มหา. ๔/๖. ขุ. อุ. ๒๕/๘๖.
जो कुछ मिले, उसी में सन्तुष्ट रहे।
วิ. ภิ. ๓/๙๖. ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๔๔.
अपने लाभ का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।
ขุ. ธ. ๒๕/๖๕.
สมณวรรค — หมวดสมณะ ๘ บท
इस शासन का श्रमण संसार में किसी का शत्रु नहीं होता।
สํ. ส. ๑๕/๖๑.
दूसरों को मारने या सताने वाला प्रव्रजित श्रमण नहीं है।
ที. มหา. ๑๐/๕๗. ขุ. ธ. ๒๕/๔๐.
असंयमी प्रव्रजित अच्छा नहीं।
ขุ. ชา. วีส. ๒๗/๔๔๖.
दम और सत्य से रहित व्यक्ति काषाय वस्त्र धारण करने योग्य नहीं।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๖. ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๘๓. ขุ. เถร. ๒๖/๔๐๐.
दम और सत्य से युक्त व्यक्ति ही काषाय वस्त्र धारण करने योग्य है।
ขุ. ธ. ๒๕/๑๖. ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๘๓. ขุ. เถร. ๒๖/๔๐๐.
ऋषियों की ध्वजा सुभाषित है।
สํ. นิ. ๑๖/๓๒๖. องฺ. จตุกฺก. ๒๑/๖๖. ขุ. ชา. อสีติ. ๒๘/๑๕๒.
श्रमण को अच्छा श्रमण होना चाहिए।
วิ. มหาวิภงฺค. ๑/๒๙๘.
श्रमण श्रमणभाव में स्थित रहे।
ส. ส.
สามัคคีวรรค — หมวดสามัคคี ๓ บท
संघ की सामग्री सुख उत्पन्न करती है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๑. ขุ. อิติ. ๒๕/๒๓๘. องฺ. ทสก. ๒๔/๘๐.
समग्र (एकमत) लोगों का प्रयत्न सुख उत्पन्न करता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๑.
समूह रूप में जनों की सामग्री उन्नति सिद्ध करती है।
ส. ส.
สีลวรรค — หมวดศีล ๘ บท
शील वृद्धावस्था तक हित सिद्ध करता है।
สํ. ส. ๑๕/๕๐.
शील वृद्धावस्था तक सुख देता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๙.
कहा जाता है कि शील ही कल्याण है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๘.
शील संसार में सर्वोत्तम है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๘.
शील साथ रहने से जाना जाता है।
นัย-ขุ. อุ. ๒๕/๑๗๘.
सर्वत्र संयम अच्छा है।
สํ. ส. ๑๕/๑๐๖. ขุ. ธ. ๒๕/๖๔.
जो सावधान रहता है, उसका वैर नहीं बढ़ता।
ที. มหา. ๑๐/๑๕๙. ขุ. อุ. ๒๕/๒๑๕.
ज्ञानी को शील की रक्षा करनी चाहिए।
ขุ. อิติ. ๒๕/๒๘๒.
สุขวรรค — หมวดสุข ๑๐ บท
दुःख के कारण को छोड़कर मनुष्य सर्वत्र सुखी होता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๙.
अहिंसा संसार में सुख है।
วิ. มหา. ๔/๖. ขุ. อุ. ๒๕/๘๖.
संस्कारों का शमन सुख है।
สํ. ส. ๑๕/๘. ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๑.
शान्ति से बढ़कर (अन्य) कोई सुख नहीं।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
निर्वाण परम सुख है।
ม. ม. ๑๓/๒๘๑. ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
बुद्धों का उत्पन्न होना सुख लाता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๑.
सद्धर्म की देशना सुख लाती है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๑.
मूर्खों को न देखने से सदा सुख होता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
जिसने मैत्री की भली-भाँति भावना की है, वह सुख से सोता और जागता है।
ว. ว.
जो हित को समझने में कुशल नहीं, उसका हित करने से सुख नहीं मिलता।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๑๕.
เสวนาวรรค — หมวดคบหา ๒๔ บท
विश्वास के कारण भय पीछे आता है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๐.
बहुत लम्बे समय तक साथ रहने से प्रिय जन भी ऊब जाते हैं।
ขุ. ชา. เตรส. ๒๗/๓๔๗.
जिसका संग करता है, वैसा ही हो जाता है।
ว. ว.
शत्रुओं के बीच एक-दो रात रहना भी दुःख है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๔.
मूर्खों के साथ रहना शत्रुओं के साथ रहने की तरह सदा दुःख देता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
ज्ञानियों के साथ रहना ज्ञातियों के समागम की तरह सुख देता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
सत्पुरुषों का समागम सुख लाता है।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๕๕.
हीन लोगों का संग करने वाला हीन हो जाता है।
องฺ. ติก. ๒๐/๑๕๘.
मूर्खों का समागम दुःख लाता है।
ขุ. ชา. นวก. ๒๗/๒๖๕.
दुर्जनों का समागम बिलकुल अच्छा नहीं।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๖๑.
सज्जनों का समागम उन्नति है।
ขุ. เถร. ๒๖/๔๐๕.
दुर्जनों का संग न करने वाला एकान्त सुख पाता है।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๔๖.
मूर्खों के साथ घूमने वाला दीर्घकाल तक शोक करता है।
ขุ. ธ. ๒๕/๔๒.
जहाँ शत्रु हों, वहाँ पण्डित को नहीं रहना चाहिए।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๔.
शत्रु से सावधान रहे, मित्र पर भी भरोसा न करे।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๕๗.
अपरिचित पर भरोसा न करे, परिचित पर भी भरोसा न करे।
ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๓๐.
मूर्खों का संग करने से केवल विनाश ही होता है।
นัย. ขุ. ชา. นวก. ๒๗/๒๖๕.
पापी पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๙๐.
बेतुका बोलने वाले पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๙๐.
अपना ही स्वार्थ देखने वाले पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๙๐.
शान्त होने का ढोंग करने वाले पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
ขุ. ชา. ทสก. ๒๗/๒๙๐.
विचारहीन लोगों का संग नहीं करना चाहिए।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๘๔.
दुर्जनों के साथ घनिष्ठता नहीं करनी चाहिए।
ขุ. ชา. ทุก. ๒๗/๕๕.
शत्रु के समान मूर्ख का संग कभी न करे।
ขุ. ชา. นวก. ๒๗/๒๖๕.
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