पुण्य करने वाला यहाँ आनन्दित होता है, मरकर भी आनन्दित होता है, दोनों लोकों में आनन्दित होता है; ‘मैंने पुण्य किया’ सोचकर आनन्दित होता है और सुगति में जाकर और भी आनन्दित होता है।
‘थोड़ा है, मुझ तक नहीं आएगा’ सोचकर पुण्य का तिरस्कार न करे; जैसे घड़ा गिरती बूँदों से भर जाता है, वैसे ही थोड़ा-थोड़ा पुण्य संचित करने वाला प्रज्ञावान पुण्य से भर जाता है।