พุทธศาสนสุภาษิต

สำหรับวิชากระทู้ธรรม — บาลี คำแปล คัมภีร์ที่มา และคำอธิบายความหมาย เพื่อใช้ศึกษาและเป็นแบบอย่างในการแต่งกระทู้ธรรม

คำอธิบายเป็นเพียงตัวอย่างการตีความ ไม่ใช่เฉลย — ใช้เป็นแนวทางเบื้องต้น และควรศึกษาเพิ่มเติมจากพระไตรปิฎกและคัมภีร์อื่น ๆ

ธรรมศึกษา (ต่างประเทศ)
นักธรรมชั้นเอก · พุทธศาสนสุภาษิต เล่ม ๓ · ๒๑๘ บท · มีคำอธิบายแล้ว ๓ บท
กิเลสวรรค — หมวดกิเลส ๒๖ บท
काम अनित्य हैं, अस्थिर हैं, बहुत दुःख वाले, बहुत विष वाले, तपे हुए लोहे के गोले के समान, संताप के मूल हैं, दुःख जिनका फल है।
ขุ. เถรี. ๒๖/๕๐๓.
संसार अविद्या से ढका हुआ प्रकट नहीं होता, कृपणता (और प्रमाद) के कारण; मैं इच्छा को संसार का लेप और दुःख को उसका महाभय कहता हूँ।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๓๐. ขุ. จู. ๓๐/๙.
संसार इच्छा से बँधा है; इच्छा को दूर करने से छूटता है; इच्छा को छोड़ देने से सब बन्धनों को काटा हुआ कहा जाता है।
สํ. ส. ๑๕/๕๖.
इच्छा मनुष्यों को खींच ले जाती है; इच्छा का संसार में त्याग कठिन है; बहुत से प्राणी इच्छा से बँधे हैं, जैसे मादा पक्षी जाल में बँधी हो।
สํ. ส. ๑๕/๖๑.
जो उपेक्षक और सदा स्मृतिमान है, संसार में अपने को दूसरों के समान, श्रेष्ठ या हीन नहीं मानता — उसे (मान रूपी) उभार वाला क्लेश न रखने वाला कहा जाता है।
ขุ. มหา. ๒๙/๒๗๙. ขุ. สุ. ๒๕/๕๐๑.
जिस भिक्षु ने भवतृष्णा को उखाड़ दिया, जिसका चित्त शान्त है, जिसने जन्म का चक्र समाप्त कर दिया, उसका पुनर्भव नहीं होता।
ขุ. อุ. ๒๕/๑๔๓.
भिक्षु यह दोष जानकर कि तृष्णा दुःख की उत्पत्ति-भूमि है, तृष्णारहित, अनासक्त और हर इरियापथ में स्मृतिमान रहे।
ขุ. สุ. ๒๕/๔๗๘. ขุ. จู. ๓๐/๓๒๐.
काम विचित्र, मधुर और मनोरम हैं, नाना रूपों में चित्त को मथते हैं; कामगुणों में दोष देखकर गैंडे के सींग की तरह अकेला विचरे।
ขุ. สุ. ๒๕/๓๓๔.
क्रोध छोड़े, मान त्यागे, सब संयोजनों को लाँघ जाए; (क्योंकि) नाम-रूप में अनासक्त, अकिंचन व्यक्ति के पीछे आसक्तियाँ नहीं लगतीं।
สํ. ส. ๑๕/๓๕๐.
क्रोध छोड़े, मान त्यागे, सब संयोजनों को लाँघ जाए; (क्योंकि) नाम-रूप में अनासक्त, अकिंचन व्यक्ति के पीछे दुःख नहीं लगते।
ขุ. ธ . ๒๕/๔๔.
तृष्णा मनुष्य को उत्पन्न करती है; उसका चित्त इधर-उधर दौड़ता है; प्राणी भटकता रहता है, इसलिए दुःख से नहीं छूटता।
สํ. ส. ๑๕/๕๑.
तृष्णा मनुष्य को उत्पन्न करती है; उसका चित्त इधर-उधर दौड़ता है; प्राणी भटकता रहता है, इसलिए दुःख उसका महाभय है।
สํ. ส. ๑๕/๕๑.
तृष्णा मनुष्य को उत्पन्न करती है; उसका चित्त इधर-उधर दौड़ता है; प्राणी भटकता रहता है, इसलिए कर्म अभी भी उसके आगे-आगे चलता है।
สํ. ส. ๑๕/๕๒.
संसार तृष्णा से रचा हुआ, जरा से घिरा हुआ और मृत्यु से बन्द किया हुआ है; इसलिए वह दुःख में स्थित है।
สํ. ส. ๑๕/๕๕.
संसार आनन्द को बन्धन और वितर्क को विचरण बनाए हुए है; तृष्णा को छोड़ देने से सब बन्धनों को काटा हुआ कहा जाता है।
สํ. ส. ๑๕/๕๕.
जिसका मन निर्वाण में लगा है, वह निद्रा, तन्द्रा और थकावट को जीत ले; प्रमाद में न रहे, अतिमान में न टिके।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๑๘.
जो अनागत का चिन्तन नहीं करता, वह अतीत का शोक नहीं करता; जो सब स्पर्शों में विवेक (एकान्त) देखता है, वह दृष्टियों में नहीं खिंचता।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๐๐. ขุ. มหา. ๒๙/๒๖๔,๒๖๒.
पुराने में आनन्द न ले, नए में रुचि न रखे; उसके नष्ट होने पर शोक न करे, तृष्णा का आश्रय न ले।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๑๘.
प्राणी-लोक मृत्यु से पीड़ित, जरा से घिरा, तृष्णा रूपी बाण से बिंधा और सदा इच्छा से धधकता हुआ है।
สํ. ส. ๑๕/๕๕.
यह प्राणी-समूह मान से युक्त, मान से बँधा, मान से जकड़ा हुआ है; दृष्टियों के कारण होड़ करता हुआ संसार को नहीं लाँघ पाता।
ขุ. อุ. ๒๕/๑๙๓.
मूढ़ अर्थ को नहीं जानता, मूढ़ धर्म को नहीं देखता; जब मोह मनुष्य पर छा जाता है, तब अन्धकार छा जाता है।
ขุ. อิติ. ๒๕/๒๙๖. ขุ. มหา. ๒๙/๑๘.
जिसे यह चिन्ता नहीं कि ‘यह मेरा है, यह दूसरे का है’ — वह किसी को अपना न मानकर ‘मेरा कुछ नहीं’ यह शोक नहीं करता।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๑๙. ขุ. มหา. ๒๙/๕๓๔.
जिसने संसार में कामों को और संसार में दुस्तर आसक्ति को पार कर लिया — तृष्णा की धारा काटकर बन्धनरहित हुआ — उसे न शोक करने वाला, न प्रसन्न होने वाला कहा जाता है।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๑๙. ขุ. มหา. ๒๙/๕๒๗.
जो अजान में उपधि रचता है, वह मूर्ख बार-बार दुःख पाता है; इसलिए दुःख की उत्पत्ति-भूमि को देखने वाला ज्ञानी उपधि न रचे।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๓๔. ขุ. จู. ๓๐/๘๐,๘๑
लोभी अर्थ को नहीं जानता, लोभी धर्म को नहीं देखता; जब लोभ मनुष्य पर छा जाता है, तब अन्धकार छा जाता है।
ขุ. อิติ. ๒๕/๒๙๕. ขุ. มหา. ๒๙/๑๗.
(क्लेश रूपी) वन को काटो, वृक्ष को नहीं; वन से भय उत्पन्न होता है। भिक्षुओ! वन और वन में उगी झाड़ियों को काटकर निर्वन हो जाओ।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๒.
บาลีอักษรโรมันถอดจากอักษรไทยโดยอัตโนมัติ · คำอธิบายแสดงเฉพาะบทที่ผ่านการตรวจทานแล้ว
ฝึกแต่งกระทู้ธรรม แบบฝึกท่องจำ ปัญหาธรรมศึกษาย้อนหลัง หน้าหลัก