काम अनित्य हैं, अस्थिर हैं, बहुत दुःख वाले, बहुत विष वाले, तपे हुए लोहे के गोले के समान, संताप के मूल हैं, दुःख जिनका फल है।
ขุ. เถรี. ๒๖/๕๐๓.
संसार अविद्या से ढका हुआ प्रकट नहीं होता, कृपणता (और प्रमाद) के कारण; मैं इच्छा को संसार का लेप और दुःख को उसका महाभय कहता हूँ।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๓๐. ขุ. จู. ๓๐/๙.
संसार इच्छा से बँधा है; इच्छा को दूर करने से छूटता है; इच्छा को छोड़ देने से सब बन्धनों को काटा हुआ कहा जाता है।
สํ. ส. ๑๕/๕๖.
इच्छा मनुष्यों को खींच ले जाती है; इच्छा का संसार में त्याग कठिन है; बहुत से प्राणी इच्छा से बँधे हैं, जैसे मादा पक्षी जाल में बँधी हो।
สํ. ส. ๑๕/๖๑.
जो उपेक्षक और सदा स्मृतिमान है, संसार में अपने को दूसरों के समान, श्रेष्ठ या हीन नहीं मानता — उसे (मान रूपी) उभार वाला क्लेश न रखने वाला कहा जाता है।
ขุ. มหา. ๒๙/๒๗๙. ขุ. สุ. ๒๕/๕๐๑.
जिस भिक्षु ने भवतृष्णा को उखाड़ दिया, जिसका चित्त शान्त है, जिसने जन्म का चक्र समाप्त कर दिया, उसका पुनर्भव नहीं होता।
ขุ. อุ. ๒๕/๑๔๓.
भिक्षु यह दोष जानकर कि तृष्णा दुःख की उत्पत्ति-भूमि है, तृष्णारहित, अनासक्त और हर इरियापथ में स्मृतिमान रहे।
ขุ. สุ. ๒๕/๔๗๘. ขุ. จู. ๓๐/๓๒๐.
काम विचित्र, मधुर और मनोरम हैं, नाना रूपों में चित्त को मथते हैं; कामगुणों में दोष देखकर गैंडे के सींग की तरह अकेला विचरे।
ขุ. สุ. ๒๕/๓๓๔.
क्रोध छोड़े, मान त्यागे, सब संयोजनों को लाँघ जाए; (क्योंकि) नाम-रूप में अनासक्त, अकिंचन व्यक्ति के पीछे आसक्तियाँ नहीं लगतीं।
สํ. ส. ๑๕/๓๕๐.
क्रोध छोड़े, मान त्यागे, सब संयोजनों को लाँघ जाए; (क्योंकि) नाम-रूप में अनासक्त, अकिंचन व्यक्ति के पीछे दुःख नहीं लगते।
ขุ. ธ . ๒๕/๔๔.
तृष्णा मनुष्य को उत्पन्न करती है; उसका चित्त इधर-उधर दौड़ता है; प्राणी भटकता रहता है, इसलिए दुःख से नहीं छूटता।
สํ. ส. ๑๕/๕๑.
तृष्णा मनुष्य को उत्पन्न करती है; उसका चित्त इधर-उधर दौड़ता है; प्राणी भटकता रहता है, इसलिए दुःख उसका महाभय है।
สํ. ส. ๑๕/๕๑.
तृष्णा मनुष्य को उत्पन्न करती है; उसका चित्त इधर-उधर दौड़ता है; प्राणी भटकता रहता है, इसलिए कर्म अभी भी उसके आगे-आगे चलता है।
สํ. ส. ๑๕/๕๒.
संसार तृष्णा से रचा हुआ, जरा से घिरा हुआ और मृत्यु से बन्द किया हुआ है; इसलिए वह दुःख में स्थित है।
สํ. ส. ๑๕/๕๕.
संसार आनन्द को बन्धन और वितर्क को विचरण बनाए हुए है; तृष्णा को छोड़ देने से सब बन्धनों को काटा हुआ कहा जाता है।
สํ. ส. ๑๕/๕๕.
जिसका मन निर्वाण में लगा है, वह निद्रा, तन्द्रा और थकावट को जीत ले; प्रमाद में न रहे, अतिमान में न टिके।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๑๘.
जो अनागत का चिन्तन नहीं करता, वह अतीत का शोक नहीं करता; जो सब स्पर्शों में विवेक (एकान्त) देखता है, वह दृष्टियों में नहीं खिंचता।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๐๐. ขุ. มหา. ๒๙/๒๖๔,๒๖๒.
पुराने में आनन्द न ले, नए में रुचि न रखे; उसके नष्ट होने पर शोक न करे, तृष्णा का आश्रय न ले।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๑๘.
प्राणी-लोक मृत्यु से पीड़ित, जरा से घिरा, तृष्णा रूपी बाण से बिंधा और सदा इच्छा से धधकता हुआ है।
สํ. ส. ๑๕/๕๕.
यह प्राणी-समूह मान से युक्त, मान से बँधा, मान से जकड़ा हुआ है; दृष्टियों के कारण होड़ करता हुआ संसार को नहीं लाँघ पाता।
ขุ. อุ. ๒๕/๑๙๓.
मूढ़ अर्थ को नहीं जानता, मूढ़ धर्म को नहीं देखता; जब मोह मनुष्य पर छा जाता है, तब अन्धकार छा जाता है।
ขุ. อิติ. ๒๕/๒๙๖. ขุ. มหา. ๒๙/๑๘.
जिसे यह चिन्ता नहीं कि ‘यह मेरा है, यह दूसरे का है’ — वह किसी को अपना न मानकर ‘मेरा कुछ नहीं’ यह शोक नहीं करता।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๑๙. ขุ. มหา. ๒๙/๕๓๔.
जिसने संसार में कामों को और संसार में दुस्तर आसक्ति को पार कर लिया — तृष्णा की धारा काटकर बन्धनरहित हुआ — उसे न शोक करने वाला, न प्रसन्न होने वाला कहा जाता है।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๑๙. ขุ. มหา. ๒๙/๕๒๗.
जो अजान में उपधि रचता है, वह मूर्ख बार-बार दुःख पाता है; इसलिए दुःख की उत्पत्ति-भूमि को देखने वाला ज्ञानी उपधि न रचे।
ขุ. สุ. ๒๕/๕๓๔. ขุ. จู. ๓๐/๘๐,๘๑
लोभी अर्थ को नहीं जानता, लोभी धर्म को नहीं देखता; जब लोभ मनुष्य पर छा जाता है, तब अन्धकार छा जाता है।
ขุ. อิติ. ๒๕/๒๙๕. ขุ. มหา. ๒๙/๑๗.
(क्लेश रूपी) वन को काटो, वृक्ष को नहीं; वन से भय उत्पन्न होता है। भिक्षुओ! वन और वन में उगी झाड़ियों को काटकर निर्वन हो जाओ।
ขุ. ธ. ๒๕/๕๒.