พุทธศาสนสุภาษิต

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ธรรมศึกษา (ต่างประเทศ)
นักธรรมชั้นเอก · พุทธศาสนสุภาษิต เล่ม ๓ · ๒๑๘ บท · มีคำอธิบายแล้ว ๓ บท
ปัญญาวรรค — หมวดปัญญา ๗ บท
सत्पुरुष निश्चय ही प्रज्ञा की प्रशंसा करते हैं; लोग धन-सम्पत्ति के प्रेमी होकर श्री (यश) चाहते हैं; पर ज्ञानियों का ज्ञान तौला नहीं जा सकता, इसलिए धन कभी प्रज्ञा से बढ़कर नहीं हो सकता।
ขุ. ชา. วีส. ๒๗/๔๒๘.
जो मन से गहरे प्रश्नों पर विचार करता है, कोई अहितकर पापकर्म नहीं करता, समय पर आए हित के मार्ग को नहीं छोड़ता — पण्डित ऐसे व्यक्ति को प्रज्ञावान कहते हैं।
ขุ. ชา. จตฺตาฬีส. ๒๗/๕๔๐.
यशस्वी होकर भी मूर्ख प्रज्ञावान का दास होता है; बातें उठने पर जिसे चतुर व्यक्ति सफाई से सँभाल लेता है, मूर्ख उसी में उलझ जाता है।
ขุ. ชา. วีส. ๒๗/๔๒๘.
ज्ञानी उस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं जो प्रज्ञावान है, सत्य बोलता है, शील में स्थित है और चित्त की शान्ति में लगा हुआ है।
ขุ. เถร. ๒๖/๔๑๑.
प्रज्ञा सुने हुए का निर्णय करने का साधन है, प्रज्ञा कीर्ति और यश बढ़ाती है; इस लोक में प्रज्ञा से युक्त व्यक्ति दुःख में भी सुख पा लेता है।
ขุ. เถร. ๒๖/๓๕๐.
सब तृप्तियों में प्रज्ञा से तृप्ति श्रेष्ठ है; प्रज्ञा से तृप्त व्यक्ति काम से संतप्त नहीं होता; तृष्णा प्रज्ञा से तृप्त व्यक्ति को वश में नहीं कर सकती।
ขุ. ชา. ทฺวาทส. ๒๗/๓๒๙.
प्रज्ञावान कामगुणों को अनित्य, दुःख और रोग के रूप में देखता है; ऐसा देखने वाला दुःख और महाभय रूप कामों में छन्द को त्याग देता है।
ขุ. ชา. จตฺตาฬีส. ๒๗/๕๔๒.
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