พุทธศาสนสุภาษิต

สำหรับวิชากระทู้ธรรม — บาลี คำแปล คัมภีร์ที่มา และคำอธิบายความหมาย เพื่อใช้ศึกษาและเป็นแบบอย่างในการแต่งกระทู้ธรรม

คำอธิบายเป็นเพียงตัวอย่างการตีความ ไม่ใช่เฉลย — ใช้เป็นแนวทางเบื้องต้น และควรศึกษาเพิ่มเติมจากพระไตรปิฎกและคัมภีร์อื่น ๆ

ธรรมศึกษา (ต่างประเทศ)
นักธรรมชั้นเอก · พุทธศาสนสุภาษิต เล่ม ๓ · ๒๑๘ บท · มีคำอธิบายแล้ว ๓ บท
สีลวรรค — หมวดศีล ๖ บท
जब भिक्षु अभिमानी, प्रमादी और बाहरी वस्तुओं में आशा रखने वाला होता है, तब शील, समाधि और प्रज्ञा परिपूर्ण नहीं होते।
ขุ. เถร. ๒๖/๓๖๐.
मार खोजने पर भी शीलसम्पन्न, अप्रमाद में रहने वाले, सम्यक् ज्ञान से विमुक्त व्यक्ति का मार्ग नहीं पाता।
ขุ. ธ. ๒๕/๒๒.
शील अतुल्य बल है, शील परम शस्त्र है, शील श्रेष्ठतम आभूषण है, शील अद्भुत कवच है।
ขุ. เถร. ๒๖/๓๕๘.
इस लोक में शील ही अग्र है, पर प्रज्ञावान सर्वोच्च है; मनुष्यों और देवताओं में विजय शील और प्रज्ञा से होती है।
ขุ. เถร. ๒๖/๓๕๘.
शील श्रेष्ठ बल-संग्रह है, शील उत्तम पाथेय है, शील श्रेष्ठतम मार्गदर्शक है; क्योंकि शील (की सुगन्ध) सब दिशाओं में फैलती है।
ขุ. เถร. ๒๖/๓๕๘.
शील महान सेतु है, शील ऐसी सुगन्ध है जिससे बढ़कर कोई सुगन्ध नहीं, शील श्रेष्ठतम अनुलेपन है; क्योंकि शील (की सुगन्ध) सब दिशाओं में फैलती है।
ขุ. เถร. ๒๖/๓๕๘.
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