พุทธศาสนสุภาษิต

สำหรับวิชากระทู้ธรรม — บาลี คำแปล คัมภีร์ที่มา และคำอธิบายความหมาย เพื่อใช้ศึกษาและเป็นแบบอย่างในการแต่งกระทู้ธรรม

คำอธิบายเป็นเพียงตัวอย่างการตีความ ไม่ใช่เฉลย — ใช้เป็นแนวทางเบื้องต้น และควรศึกษาเพิ่มเติมจากพระไตรปิฎกและคัมภีร์อื่น ๆ

ธรรมศึกษา (ต่างประเทศ)
ธรรมศึกษาชั้นโท ระดับประถมศึกษา · ขอบข่ายหลักสูตร ๙ ช่วงชั้น ๒๕๖๔ · ๑๕ บท · มีคำอธิบายแล้ว ๖ บท
ทานวรรค — หมวดทาน
ทานวรรค — หมวดทาน · ธรรมศึกษาชั้นโท ระดับประถมศึกษา
บาลี (อักษรไทย)
ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ.
Pāli (Roman) ถอดอัตโนมัติ
Dadato puññaṃ pavaḍḍhati.
คัมภีร์ที่มา : ที. มหา. ๑๐/๑๕๙. ขุ. อุ. ๒๕/๒๑๕.
คำแปล : เมื่อให้บุญก็เพิ่มขึ้น
คัมภีร์ตามขอบข่ายหลักสูตร ๒๕๖๔ : ทีฆนิกาย มหาวรรค; ขุททกนิกาย อุทาน
हिन्दी : देने से पुण्य बढ़ता है।
คำแปลทุกภาษา / All languages (9)
ไทยเมื่อให้บุญก็เพิ่มขึ้น
EnglishWhen one gives, merit increases.
IndonesiaBila seseorang berdana, kebajikan bertambah.
中文布施时,福德增长。
DeutschWenn man gibt, wächst das Verdienst.
DanskNår man giver, vokser fortjenesten.
हिन्दीदेने से पुण्य बढ़ता है।
日本語施すとき、功徳は増す。
नेपालीदिँदा पुण्य बढ्छ।

คำอธิบาย
यह व्याख्या बौद्ध सूक्ति की व्याख्या का केवल एक उदाहरण है, कोई उत्तर-कुंजी नहीं। विद्यार्थियों को इसे केवल प्रारंभिक मार्गदर्शन के रूप में उपयोग करना चाहिए। विस्तृत समझ के लिए त्रिपिटक और अन्य ग्रंथों का भी अध्ययन करें।
คำอธิบายนี้เป็นเพียงตัวอย่างการตีความพุทธศาสนสุภาษิต ไม่ใช่เฉลย ผู้ศึกษาควรใช้เป็นแนวทางเบื้องต้นเท่านั้น หากต้องการความพิสดาร ควรศึกษาเพิ่มเติมจากพระไตรปิฎกและคัมภีร์อื่น ๆ ประกอบด้วย

सूक्ति "ददतो पुञ्ञं पवड्ढति" का अर्थ है "देने वाले का पुण्य बढ़ता है।" यह सूक्ति सिखाती है कि देने से पुण्य बढ़ता है। "पुण्य" शब्द का अर्थ है वह सद्गुण जो मन को शुद्ध करता है और सुख का कारण है। जब भी कोई व्यक्ति त्यागमय मन से देता है, तो उसके मन में पुण्य उत्पन्न होता है और निरंतर संचित होता जाता है, जैसे घड़े में एक-एक बूँद टपकता पानी: थोड़ा होने पर भी, यदि वह निरंतर टपकता रहे, तो घड़ा भर जाता है।

देने से पुण्य इसलिए बढ़ता है क्योंकि देते समय देने वाले का मन कंजूसी का एक भाग त्याग देता है, और लोभ, जो मन को संकुचित करने वाला क्लेश है, क्षीण हो जाता है। तब मन विशाल और निर्मल हो जाता है। यह वह पुण्य है जो वर्तमान में ही देखा जा सकता है। व्यक्ति जितनी अधिक बार देता है, देना उतना ही उसका स्वभाव बन जाता है और मन सद्गुण में उतना ही दृढ़ होता है। यह बुद्ध-वचन इस कथन के साथ आता है कि "जो संयम रखता है, उसके प्रति वैर नहीं बढ़ता", जिससे पता चलता है कि देने से सद्गुण बढ़ता है और संयम से पाप उत्पन्न नहीं होता। ये दोनों शुभ जीवन जीने में एक जोड़ी के रूप में साथ चलते हैं।

वास्तविक जीवन में, जो व्यक्ति प्रतिदिन केवल एक कलछी भात से भिक्षा देना आरंभ करता है, लंबे समय तक ऐसा करने पर उसका मन आनंद से भर जाता है और वह अन्य सद्गुण भी अधिक करना चाहता है, जैसे विहार के कार्यों में सहायता करना, शील का पालन करना या समाज की सहायता के लिए दान करना। जो विद्यार्थी शिक्षक का सामान उठाने में या साथियों के साथ कक्षा व्यवस्थित करने में सहायता करता है, बार-बार ऐसा करने पर वह ऐसा उदार व्यक्ति बन जाता है जिसे सब प्रेम करते हैं। इस प्रकार थोड़ा किंतु नियमित देना लंबे समय में महान पुण्य बनाता है।

इसलिए जो पुण्य चाहता है, उसे बहुत धन होने तक प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि हर अवसर पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार लगन से देना चाहिए, क्योंकि हर बार देने पर पुण्य तुरंत बढ़ता है, और वह पुण्य ऐसा धन है जो हर जगह व्यक्ति के साथ चलता है, जैसा कि सूक्ति कहती है: "देने वाले का पुण्य बढ़ता है।"

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