พุทธศาสนสุภาษิต

สำหรับวิชากระทู้ธรรม — บาลี คำแปล คัมภีร์ที่มา และคำอธิบายความหมาย เพื่อใช้ศึกษาและเป็นแบบอย่างในการแต่งกระทู้ธรรม

คำอธิบายเป็นเพียงตัวอย่างการตีความ ไม่ใช่เฉลย — ใช้เป็นแนวทางเบื้องต้น และควรศึกษาเพิ่มเติมจากพระไตรปิฎกและคัมภีร์อื่น ๆ

ธรรมศึกษา (ต่างประเทศ)
ธรรมศึกษาชั้นโท ระดับอุดมศึกษาและประชาชนทั่วไป · ขอบข่ายหลักสูตร ๙ ช่วงชั้น ๒๕๖๔ · ๑๕ บท · มีคำอธิบายแล้ว ๐ บท
สีลวรรค — หมวดศีล ๓ บท
शील प्रथम आश्रय है, समस्त कल्याणधर्मों की माता है, सब धर्मों का प्रमुख है; इसलिए शील को शुद्ध करना चाहिए।
ขุททกนิกาย เถรคาถา (ขุ. เถร. ๒๖/๓๕๘.)
दुःशील निन्दा और अपयश पाता है; शीलवान सदा यश और प्रशंसा पाता है।
ขุททกนิกาย เถรคาถา (ขุ. เถร. ๒๖/๓๕๗.)
शीलवान संयम के कारण बहुत से मित्र पाता है; शीलहीन दुराचारी मित्रों से टूट जाता है।
ขุททกนิกาย เถรคาถา (ขุ. เถร. ๒๖/๓๕๗.)
ธัมมวรรค — หมวดธรรม ๔ บท
क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, चाण्डाल और नीच कर्म करने वाले इस लोक में धर्म का आचरण करके त्रयस्त्रिंश स्वर्ग में समान हो जाते हैं।
ขุททกนิกาย ชาดก (ขุ. ชา. ๒๗/๗๖/๑๗๕)
जो दिव्य भोग, आयु, यश और सुख चाहता है, वह पापों से विरत होकर तीन प्रकार के सुचरित का आचरण करे।
ขุททกนิกาย ชาดก มหานิบาต (ขุ. ชา. มหา. ๒๘/๓๐๖.)
जो अछली, अवाचाल, प्रज्ञावान, अनभिमानी और स्थिरचित्त है, वही सम्यक्सम्बुद्ध द्वारा उपदिष्ट धर्म में शोभित होता है।
อังคุตตรนิกาย จตุกกนิบาต; ขุททกนิกาย มหานิทเทส (องฺ. จตุกฺก. ๒๑/๓๔. ขุ. มหา. ๒๙/๑๕๑.)
मायावी, अभिमानी, वाचाल, डींग मारने वाले, दंभी और अस्थिर लोग सम्यक्सम्बुद्ध द्वारा उपदिष्ट धर्म में नहीं बढ़ते।
อังคุตตรนิกาย จตุกกนิบาต (องฺ. จตุกฺก. ๒๑/๓๔.)
กิเลสวรรค — หมวดกิเลส ๒ บท
ब्राह्मण! आर्यजन उस क्रोध को मारने वाले की प्रशंसा करते हैं जिसकी जड़ विष और नोक मधुर है; क्योंकि उस क्रोध को काट देने वाला शोक नहीं करता।
สังยุตตนิกาย สคาถวรรค (สํ. ส. ๑๕/๒๓๖.)
अपने ही से उत्पन्न लोभ, द्वेष और मोह दुष्टचित्त व्यक्ति को वैसे ही नष्ट करते हैं, जैसे बाँस का फूल बाँस को मार डालता है।
ขุททกนิกาย อิติวุตตกะ; ขุททกนิกาย มหานิทเทส (ขุ. อิติ. ๒๕/๒๖๔. ขุ. มหา. ๒๙/๑๘.)
ปุญญวรรค — หมวดบุญ ๓ บท
यदि पुरुष पुण्य करे, तो उसे बार-बार करे; उसमें रुचि रखे, क्योंकि पुण्य का संचय सुख लाता है।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๓๐.)
‘थोड़ा है, मुझ तक नहीं आएगा’ सोचकर पुण्य का तिरस्कार न करे; जैसे घड़ा गिरती बूँदों से भर जाता है, वैसे ही थोड़ा-थोड़ा पुण्य संचित करने वाला प्रज्ञावान पुण्य से भर जाता है।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๓๑.)
बार-बार आवश्यकता पड़ने वाले का मित्र सहायक है; पर स्वयं किए हुए पुण्य परलोक में मित्र होंगे।
สังยุตตนิกาย สคาถวรรค (สํ. ส. ๑๕/๕๑.)
วาจาวรรค — หมวดวาจา ๓ บท
केवल सुन्दर वाणी बोले, बुरी वाणी कभी न बोले; सुन्दर वाणी बोलना लाभ सिद्ध करता है, बुरी वाणी बोलने वाला संताप पाता है।
ขุททกนิกาย ชาดก เอกนิบาต (ขุ. ชา. เอก. ๒๗/๒๘.)
ऐसी वाणी बोले जो न अपने संताप का कारण हो, न दूसरों को पीड़ा पहुँचाए; वही वाणी सुभाषित है।
ขุททกนิกาย สุตตนิบาต (ขุ. สุ. ๒๕/๔๑๑.)
समय से अधिक न बोले, सदा चुप भी न रहे; समय आने पर परिमित बोले, बेतरतीब नहीं।
ขุททกนิกาย ชาดก มหานิบาต (ขุ. ชา. มหา. ๒๘/๓๓๘.)
บาลีอักษรโรมันถอดจากอักษรไทยโดยอัตโนมัติ · คำอธิบายแสดงเฉพาะบทที่ผ่านการตรวจทานแล้ว
ฝึกแต่งกระทู้ธรรม แบบฝึกท่องจำ ปัญหาธรรมศึกษาย้อนหลัง หน้าหลัก