พุทธศาสนสุภาษิต

สำหรับวิชากระทู้ธรรม — บาลี คำแปล คัมภีร์ที่มา และคำอธิบายความหมาย เพื่อใช้ศึกษาและเป็นแบบอย่างในการแต่งกระทู้ธรรม

คำอธิบายเป็นเพียงตัวอย่างการตีความ ไม่ใช่เฉลย — ใช้เป็นแนวทางเบื้องต้น และควรศึกษาเพิ่มเติมจากพระไตรปิฎกและคัมภีร์อื่น ๆ

ธรรมศึกษา (ต่างประเทศ)
ธรรมศึกษาชั้นเอก ระดับมัธยมศึกษา · ขอบข่ายหลักสูตร ๙ ช่วงชั้น ๒๕๖๔ · ๒๐ บท · มีคำอธิบายแล้ว ๓ บท
กิเลสวรรค — หมวดกิเลส ๔ บท
इच्छा मनुष्यों को खींच ले जाती है; इच्छा का संसार में त्याग कठिन है; बहुत से प्राणी इच्छा से बँधे हैं, जैसे मादा पक्षी जाल में बँधी हो।
สังยุตตนิกาย สคาถวรรค (สํ. ส. ๑๕/๖๑.)
तृष्णा मनुष्य को उत्पन्न करती है; उसका चित्त इधर-उधर दौड़ता है; प्राणी भटकता रहता है, इसलिए दुःख से नहीं छूटता।
สังยุตตนิกาย สคาถวรรค (สํ. ส. ๑๕/๕๑.)
संसार तृष्णा से रचा हुआ, जरा से घिरा हुआ और मृत्यु से बन्द किया हुआ है; इसलिए वह दुःख में स्थित है।
สังยุตตนิกาย สคาถวรรค (สํ. ส. ๑๕/๕๕.)
संसार इच्छा से बँधा है; इच्छा को दूर करने से छूटता है; इच्छा को छोड़ देने से सब बन्धनों को काटा हुआ कहा जाता है।
สังยุตตนิกาย สคาถวรรค (สํ. ส. ๑๕/๕๖.)
อัปปมาทวรรค — หมวดไม่ประมาท ๔ บท
सुबुद्धि व्यक्ति दूसरों के प्रमत्त रहते अप्रमत्त, दूसरों के सोते जागता हुआ, (मूर्ख को) पीछे छोड़ देता है, जैसे तेज़ घोड़ा निर्बल घोड़े को छोड़ देता है।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๑๘,๑๙.)
उद्यमी, स्मृतिमान, शुद्ध कर्म वाले, विचारपूर्वक काम करने वाले, संयत, धर्म से जीने वाले और अप्रमत्त व्यक्ति का यश बढ़ता है।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๑๘.)
अप्रमाद में रत रहो, अपने चित्त की रक्षा करो; अपने को दलदल से निकालो, जैसे कीचड़ में फँसा हाथी स्वयं को निकाल लेता है।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๕๘.)
प्रज्ञावान उद्यम, अप्रमाद, संयम और दम के द्वारा ऐसा द्वीप बनाए जिसे बाढ़ न डुबो सके।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๑๘.)
จิตตวรรค — หมวดจิต ๔ บท
जिसने आना-अपान स्मृति को परिपूर्ण भावित नहीं किया, उसका शरीर और चित्त दोनों काँपते हैं।
ขุททกนิกาย ปฏิสัมภิทามรรค (ขุ. ปฏิ. ๓๑/๒๕๐.)
जो चित्त दुर्दमनीय है, चंचल है, जहाँ चाहे वहाँ गिर पड़ता है, उसका दमन अच्छा है; क्योंकि दान्त चित्त सुख लाता है।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๑๙.)
प्रज्ञावान चंचल, डाँवाडोल, दुरक्ष्य और दुर्निवार्य चित्त को सीधा करता है, जैसे बाण बनाने वाला बाण को सीधा करता है।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๑๙.)
जैसे ठोस चट्टान का पहाड़ हवा से नहीं हिलता, वैसे ही पण्डित निन्दा और प्रशंसा से विचलित नहीं होते।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๒๕.)
ปัญญาวรรค — หมวดปัญญา ๔ บท
प्रज्ञा सुने हुए का निर्णय करने का साधन है, प्रज्ञा कीर्ति और यश बढ़ाती है; इस लोक में प्रज्ञा से युक्त व्यक्ति दुःख में भी सुख पा लेता है।
ขุททกนิกาย เถรคาถา (ขุ. เถร. ๒๖/๓๕๐.)
धन नष्ट हो जाने पर भी प्रज्ञावान जीवित रह सकता है; पर प्रज्ञाहीन धनी होकर भी जी नहीं सकता।
ขุททกนิกาย เถรคาถา (ขุ. เถร. ๒๖/๓๕๐.)
यदि थोड़े सुख को त्यागने से विपुल सुख दिखाई दे, तो प्रज्ञावान विपुल सुख को देखकर थोड़े सुख को छोड़ दे।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๕๓.)
मन्दबुद्धि और अस्थिर चित्त वाला सौ वर्ष जिए, उससे प्रज्ञावान ध्यानी का एक दिन जीना श्रेष्ठ है।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๑๙.)
ปกิณณกวรรค — หมวดเบ็ดเตล็ด ๔ บท
जो दूसरों को दुःख देकर अपना सुख चाहता है, वह वैर में उलझा रहता है और वैर से मुक्त नहीं होता।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๕๓.)
जैसे छोटी-सी लकड़ी के सहारे तैरने वाला समुद्र में डूब जाता है, वैसे ही आलस्य का सहारा लेने वाला धनी भी डूब जाता है।
ขุททกนิกาย เถรคาถา (ขุ. เถร. ๒๖/๓๐๙.)
जो असार को सार समझता है और सार को असार देखता है, वह मिथ्या संकल्प को गोचर बनाए हुए सार को नहीं पाता।
ขุททกนิกาย ธรรมบท (ขุ. ธ. ๒๕/๑๖.)
जो निद्रालु, बातूनी, अनुद्यमी, आलसी और उग्र है — यह उसके विनाश का कारण है।
ขุททกนิกาย สุตตนิบาต (ขุ. สุ. ๒๕/๓๔๖.)
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